BB Chaudhary

विविध परीक्षाओं से सम्बंधित पूछे जाने वाले प्रश्नों के समाधान

भीम बहादुर चौधरी

LightBlog

Breaking

Showing posts with label PDF. Show all posts
Showing posts with label PDF. Show all posts

Friday, August 5, 2022

August 05, 2022

मंगल_पांडे (क्रांतिकारी)

#मंगल_पांडे (क्रांतिकारी)

* मंगल पांडे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम क्रांतिकारी थे
* भारत की आजादी की पहली लड़ाई अर्थात 1857 के संग्राम की शुरुआत इन्हीं के विद्रोह से शुरू हुआ था
* मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गांव में हुआ था
* मंगल पांडे का जन्म तारीख व स्थान पर अभी भी विवाद है
* मंगल पांडे के पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का अभय रानी देवी था
* मंगल पांडे एक बहन और तीन भाई थे
* मंगल पांडे जीवन भर अविवाहित थे
* मंगल पांडे कट्टर पंडित थे
* एक बार मंगल किसी काम से अकबरपुर आए थे उसी समय ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना बनारस से लखनऊ जा रही थी मंगल सेना का मार्च देखने के लिए कौतुहलवश सड़क के किनारे आकर खड़े हो गये
* एक सैनिक अधिकारी ने मंगल पांडे को तगड़े और स्वस्थ देखकर सेना में भर्ती हो जाने का आग्रह किया, गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें रोजी-रोटी की मजबूरी ने अंग्रेजों की फौज में नौकरी करने पर मजबूर कर दिया
* 10 मई सन 1846 को मंगल पांडे ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए
* मंगल पांडे कोलकाता के पास बैरकपुर सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री की पैदल सेना के 1446 नंबर के सैनिक थे
* मंगल को वेतन के रूप में ₹7 प्रति महीना मिलता था
* 30 जनवरी 1857 को एक जमादार ने इन्हें यह बताया कि अंग्रेज जो कारतूस देते हैं वह गौ मांस का बना होता है
* गौ मांस के नाम पर मंगल पांडे आग बबूला हो गए और अपने साथी सैनिकों को भी बताएं तो वह भी क्रोधित हो गए
* 29 मार्च 1857 की सुबह बैरकपुर छावनी के परेड मैदान में मंगल पांडे ने अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल फूंका था
* जनरल ह्राूसन ने एक जमादार को मंगल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया पर वह अनसुना कर दिया था क्योंकि वह भारतीय था इसलिए इसे 6 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई थी
* मिस्टर बासु घोड़े पर सवार होकर मंगल की तरफ आने लगे तो मंगल ने उनपर गोलिया दाग दी और वह नीचे गिर गए इस तरह आजादी की पहली गोली चली थी
* मंगल पांडे ने ह्राूसन के बीच में आने पर उसे भी गोली मार दिए थे और इस तरह पूरा बैरकपुर छावनी गोलियों से गूंज उठा था
* मंगल पांडे ने अपने साथी सैनिकों के साथ न देने पर खुद को गोली मार ली और घायल हो गए जिससे वह गिरफ्तार कर लिये गये
* मंगल पांडे को फांसी की सजा 18 अप्रैल 1857 को रखी गई थी पर लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शन के कारण उसके 10 दिन पहले ही 8 अप्रैल 1857 को इन्हें फांसी दे दी गई
* धर्म के लिहाज से कोई जल्लाद इन्हें फांसी देने को तैयार नहीं था इसलिए अंग्रेजों ने कोलकाता से एक जल्लाद को बुलाया था जिसे यह नहीं बताया गया कि उसे किसे फांसी देनी है
* मंगल पांडे जिस पलटन में थे, उसके सारे सैनिकों को सस्पेंड कर दिया गया क्योंकि अंग्रेज़ों को शक था कि वो सभी मंगल पांडे जैसे विचार रखते है और किसी भी समय उनके खिलाफ़ विद्रोह कर सकते है

टेलीग्राम 
https://t.me/bbChaudhary


August 05, 2022

दलबदल_की_बीमारी_एक_बार_फिर_लोकतंत्र_के_लिए_चुनौती_बन_रही है।

#दलबदल_की_बीमारी_एक_बार_फिर_लोकतंत्र_के_लिए_चुनौती_बन_रही है।*

यह दलबदल का बदला स्वरूप संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल विरोधी कानून के प्रावधानों को बाइपास करता हुआ संसदीय प्रणाली के लोकतंत्र पर सीधा करारा हमला है। वर्ष 1967 से 1972 के बीच दलबदल के संक्रमण ने लगभग सभी राज्यों की सरकारों को अपनी चपेट में लिया था। फिर इस बीमारी से निजात पाने के लिए 1985 में राजीव गांधी सरकार ने संसद में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा दलबदल विरोधी कानून को संविधान में 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा।

हालांकि, 10वीं अनुसूची में लागू दलबदल विरोधी कानून के प्रावधान बिल्कुल स्पष्ट हैं परंतु राजनेता आम नागरिकों को इन प्रावधानों के बारे में भ्रमित करते रहते हैं क्योंकि आम लोगों के सामने कानून के प्रावधान संपूर्ण रूप में न आकर टुकड़ों में आते हैं। सांसदों या विधायकों की तीन श्रेणियां होती हैं। एक राजनीतिक दल के सदस्य के रूप में उस दल के चुनाव चिन्ह पर चुने हुए सदस्य के रूप में, दूसरे स्वतंत्र रूप से चुने गए निर्दलीय सदस्य व तीसरे नामित सदस्य।

10वीं सूची में वर्णित दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी भी सदन के राजनीतिक दल के संबंधित सदस्य को अयोग्य घोषित होने की तीन शर्तें हैं, पहली कोई दलीय विधायक या सांसद राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह पर निर्वाचित होने के बाद स्वेच्छा से दल का त्याग कर दे। दूसरी, विधायक या सांसद अपने दल के व्हिप के निर्देशों का उल्लंघन कर सदन में मतदान में उपस्थित न हो और तीसरी व्हिप के निर्देशानुसार सदन में मतदान न करे। 

निर्दलीय विधायक या सांसद अपने कार्यकाल में किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता नहीं ले सकता, अगर वह किसी भी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण कर ले तो उसे आयोग्य घोषित किया जा सकता है।

वर्ष 1985 के दलबदल विरोधी कानून के तहत 10वीं सूची के पैरा-3 में मूल राजनीतिक दल में विभाजन का प्रावधान था, जिसमें सदन के एक-तिहाई सदस्य एक समूह बनाकर दल में विभाजन करने पर दलबदल कर अयोग्य घोषित होने से बच जाते थे। पिछली सदी के नब्बे के दशक में जमकर दलबदल की घटनाओं ने संसदीय प्रणाली की जड़ें हिला दी थीं, जिसका समाधान 2003 के 91वें संविधान संशोधन ने इस दल विभाजन के 10वीं अनुसूची के पैरा-3 के प्रावधान को समाप्त कर दिया। 2003 के संशोधन उपरांत 10वीं अनुसूची के पैरा-4 में वर्णित केवल मूल राजनीतिक दल के दूसरे राजनीतिक दल में विलय पर सदन के दलीय सदस्यों को अयोग्यता से बचाव का प्रावधान है, बशर्ते इस विलय के लिए मूल राजनीतिक दल के दो-तिहाई सदस्य सहमत व साथ हों।

किसी राजनीतिक दल से संबंधित विधायक या सांसद अगर उस दल द्वारा निष्काषित कर दिया जाता है तो भी वह उस दल के व्हिप अनुसार सदन में मतदान के समय उपस्थित रहने व मतदान करने का पाबन्द रहेगा और अगर वह किसी और दल की सदस्यता ग्रहण करता है तो भी अयोग्य घोषित किया जा सकता है। वर्ष 2003 के 91वें सशोधन में केन्द्र व राज्यों में निचले सदन की सदस्य संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक मंत्रियों की संख्या पर भी रोक लगा दी परंतु छोटे राज्यों में न्यूनतम मंत्रियों की संख्या सात रखी है। उपरोक्त संशोधानुसार 10वीं सूची के पैरा-2 के तहत अयोग्य घोषित विधायक या सांसद अयोग्य घोषित अवधि के दौरान मंत्री पद पर नियुक्त नहीं हो सकता परंतु उस पर उस अवधि में पुनः चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है अतः वह उस अवधि के दौरान दोबारा चुनाव जीतकर मंत्री बन सकता है। पिछले साल कर्नाटक विधानसभा स्पीकर ने विधायकों को अयोग्य घोषित करने के साथ उन पर उस अवधि में दोबारा चुनाव लड़ने पर रोक भी लगाई थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने असंवैधानिक करार दिया। वर्ष 2003 के उपरोक्त संविधान संशोधन ने 10वीं अनुसूची के पैरा-2 के तहत अयोग्य ठहराए गए सदस्य को केन्द्र या राज्य में कोई भी लाभकारी राजनीतिक पद लेने पर भी रोक लगा रखी है। लोकसभा व राज्यसभा के सभापति, उपसभापति व राज्य के विधान परिषद के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष को 10वीं अनुसूची के तहत उनके इन पद पर चुने जाने उपरांत उस दल की सदस्यता, जिसके चुनाव चिन्ह पर वे चुनकर आए थे, स्वेच्छा से छोड़ने पर अयोग्य घोषित नहीं किए जा सकते बशर्ते इसी अवधि में दोबारा दल की सदस्यता ग्रहण न की हो। 

10वीं अनुसूची के उपरोक्त प्रावधानों के तहत सदस्यों के दलबदल पर सदस्यों को अयोग्य घोषित करने की सारी शक्ति व अधिकार लोकसभा व विधानसभाओं के स्पीकरों को अपने सदनों के सदस्यों के बारे दलबदल से संबंधित फैसले की पूर्ण शक्ति व अधिकार दिए गए हैं तथा अदालतों के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाई गई है। परंतु पिछले तीन दशकों के सदनों के स्पीकर व पीठासीन अधिकारियों ने दलबदल से संबंधित मामलों के निपटारों में अपने दायित्वों का निष्पक्षता से पालन न करके पार्टी प्रतिबद्धताओं को प्राथमिकता दी। अयोग्यता का फैसला करने के समय उनके कार्य व आचरण हमेशा पक्षपाती और सत्ताधारी पार्टी की तरफ रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी की सहूलियत अनुसार किसी दलबदल के केस को तीन-चार साल तक लटकाए रखते हैं तो किसी का फैसला दिनों में ही कर देते हैं। इन्ही कारणों से अब दलबदल विरोधी कानून के तहत पारित प्रत्येक आदेश न सिर्फ न्यायालयों में न्यायिक जांच के अधीन है, बल्कि अब स्पीकर द्वारा आरोपित विधायक को जारी नोटिस पर भी न्यायालय स्टे देने लग गए हैं। माननीय उच्चतम न्यायालय ने तो इस कानून के तहत मामलों के निपटारे के लिए एक स्थायी न्यायाधिकरण स्थापित करने की सलाह दी है।
August 05, 2022

हाउस_अरेस्ट_या_नज़रबंदी

#हाउस_अरेस्ट_या_नज़रबंदी_किसे_कहते_हैं_और_इससे_जुड़े_नियम_क्या_हैं?
जम्मू और कश्मीर में जारी गतिरोध के बीच सरकार ने महबूबा मुफ़्ती और और अन्य नेताओं को एहतियात के तौर पर हाउस अरेस्ट कर दिया है. इसके पहले भीमा कोरेगांव हिंसा के मामले में पुणे की पुलिस ने पांच बुद्धिजीवियों और राइट एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार किया था. सुप्रीम कोर्ट ने इन लोगों को हाउस अरेस्ट रखने के आदेश जारी किये हैं. अब यह सवाल उठता है कि आखिर यह हाउस अरेस्ट या नज़रबंदी क्या होती है.

#अरेस्ट_वॉरंट_या_गिरफ़्तारी_के_आदेश

किसी अभियुक्त को गिरफ्तार करने के लिए कोर्ट अरेस्ट वॉरंट यानि गिरफ्तारी का आदेश जारी करता है. अरेस्ट वॉरंट के तहत संपत्ति की तलाशी ली जा सकती है और उसे जब्त भी किया जा सकता है. अपराध की प्रकृति के आधार पर अरेस्ट वॉरंट की प्रकृति भी निर्भर करती है. अरेस्ट वॉरंट जमानती और गैर-जमानती हो सकता है. संज्ञेय अपराध की स्थिति में पुलिस अभियुक्त को बिना अरेस्ट वॉरंट के गिरफ़्तार कर सकती है.

#सर्च_वॉरंट

सर्च वॉरंट वह कानूनी अधिकार है जिसके तहत पुलिस या फिर जांच एजेंसी को घर, मकान, बिल्डिंग या फिर व्यक्ति की तलाशी के आदेश दिए जाते हैं. पुलिस इसके लिए मजिस्ट्रेट या फिर जिला कोर्ट से इजाजत मांगती है.

#हाउस_अरेस्ट_या_नज़रबंदी

जब तक कोर्ट यह तय नहीं कर पाती है कि कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए दोषी है या नहीं तो उसे जेल नहीं भेजती है और उस आरोपी व्यक्ति को खुला घूमने से रोकने के लिए कोर्ट हाउस अरेस्ट या नज़रबंदी का आदेश देती है. इसका मतलब सिर्फ इतना होता है कि गिरफ्तार किया गया व्यक्ति अपने घर से बाहर न निकल पाए. #हालाँकि_भारतीय_कानून_में_हाउस_अरेस्ट_शब्द_का_ज़िक्र_नहीं_है. अर्थात हाउस अरेस्ट की स्थिति में व्यक्ति को थाने या फिर जेल नहीं ले जाया जाता है बल्कि उसके घर में ही बंद रखा जाता है.

हाउस अरेस्ट के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति किस से बात करे, किससे नहीं, इस पर पांबदी लगाई जा सकती है. आरोपी व्यक्ति को सिर्फ घर के लोगों और अपने वकील से बातचीत की इजाजत दी जा सकती है.

#हाउस_अरेस्ट_की_दशा_में;

1. यह सोचना बिलकुल गलत है कि घर में नजरबन्द व्यक्ति हमेशा घर में जेल की तरह कैद रहता है बल्कि सच यह है कि यदि आरोप बहुत संगीन नहीं हैं तो आरोपी को उसके सामान्य काम जैसे स्कूल, डॉक्टर से मिलना, किसी से मिलना, सामुदायिक सेवा और अदालतों द्वारा तय किये गए अन्य काम करने की अनुमति होती है. हालाँकि इस दौरान सुरक्षा कर्मी आरोपी के साथ रहेंगे और उसे एक इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग डिवाइस पहनना होगा.

2. हाउस अरेस्ट कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के पहले की दशा है अर्थात इस दशा में व्यक्ति को बिना जेल भेजे जेल जैसी स्थितियों में रखने की कोशिश होती है.

3. #सामान्यतः आरोपी व्यक्ति को बाहर यात्रा करने की छूट नहीं होती है हालाँकि किन्ही विशेष दशाओं में अनुमति दी जा सकती है.

4. हाउस अरेस्ट की सजा क्रिमिनल लोगों को भी दी जा सकती है यदि जेल की सजा किन्ही विशेष कारणों से ठीक/सुरक्षित नहीं है.

5. आमतौर पर घर में नजरबन्द व्यक्ति को किसी भी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के इस्तेमाल की अनुमति नहीं होती है लेकिन यदि इस्तेमाल करने की छूट मिलती है तो उसका इस्तेमाल सम्बंधित अधिकारियों की निगरानी में ही होता है.

6. आरोपी व्यक्ति पर नजर रखने के लिए उसे किसी विशेष #इलेक्ट्रॉनिक_डिवाइस को पहनने को कहा जाता है ताकि उस पर दिन रात नजर रखी जा सके.

7. हाउस अरेस्ट की दशा में आरोपी व्यक्ति को इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस और मोनिटरिंग सर्विस का भुगतान खुद करना होगा.

8. हाउस अरेस्ट का बड़ा नुकसान यह है कि इसमें आरोपी व्यक्ति को उसके अच्छे आचरण के कारण सजा में छूट नहीं मिलती है जैसे कि जेल में रहते हुए कैदी को मिलती है.

#हाउस_अरेस्ट_की_दशा_में_आरोपी_व्यक्ति_के_क्या_अधिकार_होते_हैं;

चाहे आप वयस्क नागरिक हों या गैर-नागरिक हों, अगर आपको गिरफ्तार किया गया है तो आपके पास कुछ अधिकार हैं जिन्हें आपको बताना कानून प्रवर्तन अधिकारी की जिम्मेदारी है. ये अधिकार हैं ;

1. हाउस अरेस्ट की अवस्था में यदि किसी व्यक्ति से कोई इन्वेस्टीगेशन करनी होती है तो उसका वकील उसके साथ बैठ सकता है यदि कोई आरोपी वकील को हायर नहीं कर सकता है तो उसे वकील अदालत की तरफ से दिया जाता है.

2. हाउस अरेस्ट की दशा में आरोपी के पास यह अधिकार होता है कि वह अपना नाम, पता और पहचान चिन्ह के अलावा कुछ भी बताने से इंकार कर सकता है.

3. आरोपी इस पूछताछ के दौरान जो कुछ भी बोलता है उसका इस्तेमाल आरोपी के खिलाफ अदालत में सबूत के तौर पर किया जा सकता है.

ऊपर लिखे गए तीनों अधिकार आरोपी को संविधान ने दिए हैं. यदि कानून प्रवर्तन अधिकारी इन अधिकारों के बारे में आरोपी व्यक्ति को नहीं बताता है तो उसके द्वारा हाउस अरेस्ट के दौरान दिया गया स्टेटमेंट उसके खिलाफ अदालत में सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.

ऊपर लिखे गए तथ्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि हाउस अरेस्ट, जेल की तुलना में थोड़ी राहत भरी सजा होती है. इसके साथ ही यह कम खर्चीली दंडात्मक कार्यवाही है जो कि अपराध पर नियंत्रण करने के लिए बनायीं गयी है.