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भीम बहादुर चौधरी

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Tuesday, November 8, 2022

November 08, 2022

लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता

लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता

यह एडिटोरियल 07/11/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “The Uniform Civil Code” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) की संवैधानिकता और अन्य संबंधित मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।


संदर्भ:

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और इसका अर्थ यह है कि राज्य किसी धर्म विशेष का समर्थन नहीं करता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य वह होता है जो धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद (अनुच्छेद 14-18) समता को और लैंगिक आधार पर गैर-भेदभाव को अनिवार्य बनाते हैं। हालाँकि, कई कानून मौजूद हैं जो स्पष्ट रूप से इन सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और विशेष रूप से कुछ समुदायों के पर्सनल लॉ (Personal laws) में बने रहे हैं, जहाँ ऐसे प्रावधान शामिल हैं जिन्हें महिलाओं के विरुद्ध अत्यधिक भेदभावपूर्ण माना जाता है।

भारतीय आबादी में लगभग आधी हिस्सेदारी के साथ महिलाएँ एक लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण संहिता की माँग करती रही हैं ताकि वे भी समता और न्याय का उपभोग कर सकें, चाहे वे किसी भी समुदाय से संबंधित हों। लेकिन भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code- UCC) के आदर्श को अभी तक हासिल नहीं किया जा सका है।

चूँकि समान नागरिक संहिता राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील विषय है, हमारे संविधान निर्माता भी एक समझौते की स्थिति में रहे और इसे उन्होंने अनुच्छेद 44 के अंदर राज्य नीति के एक निदेशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया।

चूँकि भारत लैंगिक समता के लिये प्रयासरत है, देश के लिये UCC की प्रासंगिकता पर गहनता से विचार किया जाना आवश्यक है।

समान नागरिक संहिता क्या है?

  • राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत (DPSP) के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि पूरे देश में नागरिकों के लिये समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य भारत में प्रत्येक प्रमुख धार्मिक समुदाय के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों के आधार पर प्रचलित व्यक्तिगत कानूनों को प्रत्येक नागरिक को एकसमान रूप से नियंत्रित करने वाले नियमों के एक सामान्य समूह से प्रतिस्थापित करना है।
  • UCC में ‘यूनिफॉर्म’ या समान का अर्थ है:
    • समुदायों के बीच कानूनों की एकरूपता/एकसमता।
    • समुदायों के भीतर कानूनों की एकरूपता ताकि पुरुषों एवं महिलाओं के अधिकारों के बीच समानता सुनिश्चित हो।

भारत में UCC की दिशा में किये गए प्रमुख प्रयास

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954: वर्ष 1954 का विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act of 1954)किसी भी नागरिक के लिये, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, सिविल मैरेज का प्रावधान करता है; इस प्रकार, किसी भी भारतीय को किसी भी धार्मिक व्यक्तिगत कानून की सीमाओं के बाहर विवाह करने की अनुमति देता है।
  • शाह बानो केस, 1985: इस मामले में शाह बानो के भरण-पोषण के दावे को ठुकरा दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (जो पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के रखरखाव के संबंध में सभी नागरिकों पर लागू होता है) के तहत उसके पक्ष में निर्णय दिया था।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह अनुशंसा भी की थी कि लंबे समय से लंबित समान नागरिक संहिता को अंततः अधिनियमित किया जाना चाहिये।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने सरला मुद्गल मामले (1995) और पाउलो कॉटिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा मामले (2019) में भी सरकार से UCC लागू करने का आह्वान किया।

UCC के पक्ष में तर्क

  • युवाओं की आकांक्षाओं को समायोजित करना: जैसे-जैसे दुनिया डिजिटल युग की ओर आगे बढ़ रही है, युवा आबादी की सामाजिक दृष्टि और आकांक्षा समानता, मानवता एवं आधुनिकता के सार्वभौमिक एवं वैश्विक सिद्धांतों से प्रेरित होकर आकार ग्रहण कर रही है।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता के अधिनियमन से राष्ट्र निर्माण की दिशा में उनकी पूरी क्षमता को साकार कर सकने में मदद मिलेगी।
  • राष्ट्रीय एकता का समर्थन: संविधान सभी नागरिकों को विधि न्यायालयों के समक्ष समान व्यवहार की गारंटी प्रदान करता है चाहे वह आपराधिक कानून हो या अन्य नागरिक कानून (व्यक्तिगत कानूनों को छोड़कर)।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन सभी के लिये समान व्यक्तिगत कानून प्रदान करेगा, जिसके परिणामस्वरूप भेदभाव या रियायतों के मुद्दों का राजनीतिकरण समाप्त हो जाएगा। यह समुदाय विशेष द्वारा उनके विशिष्ट धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर उपभोग किये जाते असाधारण लाभ की स्थिति को भी समाप्त कर देगा।
  • पितृसत्तात्मक मानसिकता से ऊपर उठना: अधिकांश धर्मों के मौजूदा व्यक्तिगत कानून समाज के उच्चवर्गीय पितृसत्तात्मक अवधारणाओं पर आधारित हैं। इस प्रकार, समान नागरिक संहिता का संहिताकरण एवं कार्यान्वयन पितृसत्तात्मक रूढ़िवादिता की पवित्रता या स्वीकृति को नष्ट कर सकेगा।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता लैंगिक समानता को बढ़ावा देगी और पुरुषों एवं महिलाओं दोनों को बराबरी के स्तर पर लाएगी।
  • न्यायिक प्रक्रिया के लिये सुविधाजनक: देश में हिंदू संहिता, शरिया कानून आदि कई व्यक्तिगत कानून मौजूद हैं। इतने सारे कानूनों की उपस्थिति व्यक्तिगत मामलों के निर्णय में भ्रम, जटिलता और विसंगतियाँ उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप विलंबन या अपूर्ण न्याय की स्थिति भी बनती है।
    • UCC न्यायपालिका को कुशलतापूर्वक और उचित समय सीमा के भीतर न्याय कर सकने में सक्षम करेगी।

UCC के विरुद्ध तर्क

  • 21वीं विधि आयोग की रिपोर्ट: भारत के विधि आयोग का मत है कि देश में किसी समान नागरिक संहिता का होना व्यक्तिगत/पारिवारिक कानूनों में निहित संघर्षों को सुलझाने के लिये न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।
    • आयोग ने कहा है कि कई देश अब विभिन्न समूहों में अंतर या विविधता को स्वीकार करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, और केवल अंतर का अस्तित्व में होना भेदभावपरक नहीं माना जा सकता, बल्कि यह तो एक मज़बूत लोकतंत्र का संकेतक है।
    • इसलिये, आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त भेदभाव एवं असमानता से निपटने के लिये मौजूदा पारिवारिक कानूनों में संशोधन का सुझाव दिया है, न कि उनके बीच अंतरों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए।
  • सांस्कृतिक रूप से विविध भारत के प्रतिकूल: भारत में धर्मों, संप्रदायों, जातियों, राज्यों आदि में व्यापक विविधतपूर्ण संस्कृति के कारण विवाह जैसे व्यक्तिगत मुद्दों के लिये समान नियमों का एक समूह लागू कर सकता कठिन है और इसमें कई व्यावहारिक जटिलताएँ सामने आएँगी।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करते हैं। समान नागरिक संहिता को कई समुदायों, विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा अपनी धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के लिये एक खतरे के रूप में देखा जाता है ।
    • वे मानते हैं कि समान नागरिक संहिता उनकी परंपराओं की उपेक्षा करेगी और ऐसे नियम लागू करेगी जो मुख्य रूप से बहुसंख्यक धार्मिक समुदायों से प्रभावित होंगे।
  • जनजातियों के स्वदेशी अधिकारों के विरुद्धनगा समुदाय ने दावा किया है कि UCC के कार्यान्वयन से उनकी संस्कृति और गरिमा के लिये स्पष्ट अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं।
    • यह संभावित रूप से सामाजिक अव्यवस्था का कारण बन सकता है, क्योंकि जनजातियों का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन देश के अन्य लोगों से व्यापक रूप से अलग है।

निष्कर्ष

  • UCC के लक्ष्य को आदर्श रूप से एक सर्वव्यापक दृष्टिकोण के बजाय एक परत -दर-परत दृष्टिकोण के माध्यम से खंडों में प्राप्त किया जाना चाहिये। समान संहिता कोड की तुलना में एक न्यायसंगत संहिता का होना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • समान नागरिक संहिता का खाका तैयार करते समय UCC की सामाजिक अनुकूलन क्षमता पर भी विचार करने की आवश्यकता है। चाहे सभी धर्मों के लिये एक ही कानून बनाया जाए या अलग-अलग धर्मों/समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार किया जाए, वे लैंगिक न्याय पर आधारित होने चाहिये और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि हमारे संविधान में निहित समता का सिद्धांत बरकरार रहे।
  • सार यह है कि सरकार और समाज को एक समान नागरिक समाज की ओर आगे बढ़ने के लिये भरोसे का निर्माण करने की आवश्यकता है जहाँ मानवाधिकारों के प्रति का सम्मान हो और लैंगिक समानता को प्रोत्साहन दिया जाता हो। इस स्थिति का निर्माण किसी समान नागरिक संहिता से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

अभ्यास प्रश्न: भारत में समान नागरिक संहिता के महत्त्व और इसके कार्यान्वयन की राह की बाधाओं पर विचार कीजिये।

November 08, 2022

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022


प्रिलिम्स के लिये:

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, विश्व मौसम विज्ञान संगठन, ग्रीनहाउस गैसें

मेन्स के लिये:

बढ़ती आपदा से संबंधित मुद्दे और इस संबंध में कदम उठाने की ज़रूरत।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने प्रोविज़नल स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022 जारी की।

  • पूर्ण और अंतिम रिपोर्ट अप्रैल 2023 में प्रकाशित होने की उम्मीद है।

WMO स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट:

  • यह रिपोर्ट वार्षिक आधार पर तैयार की जाती है, जो छठी IPCC आकलन रिपोर्ट द्वारा प्रदान किये गए हाल के मूल्यांकन चक्र का पूरक है।
  • रिपोर्ट प्रमुख जलवायु संकेतकों और चरम घटनाओं एवं उनके प्रभावों पर रिपोर्टिंग का उपयोग करके जलवायु की वर्तमान स्थिति पर एक आधिकारिक सहयोग प्रदान करती है।

प्रमुख बिंदु

  • ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में वृद्धि:
    • तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4) और नाइट्रस ऑक्साइड (NO2) की सांद्रता वर्ष 2021 में रिकॉर्ड स्तर पर थी।
    • मीथेन, जो कि ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति उत्पन्न करने में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक शक्तिशाली है, के उत्सर्जन में सबसे तेज़ गति से वृद्धि हुई है।
      • ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में देशों ने वर्ष 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में कम-से-कम 30% की कटौती करने का संकल्प लिया था।
  • तापमान:
    • वर्ष 2022 में वैश्विक औसत तापमान वर्ष 1850-1900 औसत से लगभग 1.15 डिग्री सेल्सियस अधिक होने का अनुमान है।
    • वर्ष 2015 से 2022 तक आठ सबसे गर्म वर्ष रहने का अनुमान है।
    • ला नीना (भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के जल का ठंडा होना) की स्थिति वर्ष 2020 के अंत से प्रभावी है और वर्ष 2022 के अंत तक जारी रहने की उम्मीद है।
      • ला नीना ने पिछले दो वर्षों से निरंतर वैश्विक तापमान को अपेक्षाकृत कम किया है, फिर भी वर्ष 2011 में पिछले महत्त्वपूर्ण ला नीना की तुलना में यह अधिक है।
  • ग्लेशियर और बर्फ:
    • वर्ष 2022 में यूरोपीय आल्प्स में ग्लेशियर पिघलने का रिकॉर्ड टूट गया। पूरे आल्प्स में 3 और 4 मीटर से अधिक की औसत मोटाई के ग्लेशियर के नुकसान के साथ वर्ष 2003 के पिछले रिकॉर्ड की तुलना में यह काफी अधिक मापा गया है।
    • प्रारंभिक माप के अनुसार, स्विट्ज़रलैंड में वर्ष 2021 और 2022 के बीच ग्लेशियर की बर्फ 6% पिघल गई।
    • इतिहास में पहली बार उच्चतम माप स्थलों पर भी गर्मी के मौसम में बर्फ नहीं गिरी और इस प्रकार नवीन बर्फ का संचय नहीं हुआ।
  • समुद्र स्तर में वृद्धि:
    • उपग्रह altimeter रिकॉर्ड के 30 वर्षों (1993-2022) के दौरान वैश्विक औसत समुद्र स्तर में अनुमानित 3.4 ± 0.3 मिमी प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई है।
    • वर्ष 1993-2002 और 2013-2022 के बीच यह दर दोगुनी हो गई है तथा जनवरी 2021 एवं अगस्त 2022 के बीच समुद्र के स्तर में लगभग 5 मिमी. की वृद्धि हुई है।
  • महासागरीय ऊष्मा:
    • मानव द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के परिणामस्वरूप संचित ऊष्मा का लगभग 90% समुद्र में जमा हो जाता है।
    • ऐसा पाया गया कि वर्ष 2021 में समुद्र के ऊपरी सतह से लेकर 2000 मीटर तक अभूतपूर्व स्तर तक गर्म हुआ।
    • कुल मिलाकर, समुद्री सतह के 55% हिस्से ने वर्ष 2022 में कम -से-कम एक समुद्री हीटवेव का अनुभव किया
    • जबकि समुद्र की सतह के केवल 22% हिस्से में ही समुद्री ठंड का अनुभव हुआ। शीत लहरों की तुलना में समुद्री हीटवेव लगातार अधिक होती जा रही है।
  • खराब मौसम:
    • विगत 40 वर्षों की तुलना में पूर्वी अफ्रीका में लगातार चार वर्षों से बारिश औसत से कम रही है जो इस बात का संकेत हो सकती है कि वर्तमान मौसम भी शुष्क हो सकता है।
    • जुलाई और अगस्त, 2022 में रिकॉर्ड तोड़ बारिश के कारण पाकिस्तान में बाढ़ की स्थिति बन गई ।
      • भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में मार्च और अप्रैल में हीटवेव के बाद बाढ़ आई थी।
    • उत्तरी गोलार्द्ध के बड़े हिस्से असाधारण रूप से गर्म और शुष्क रहे थे।
      • राष्ट्रीय रिकॉर्ड दर्ज किये जाने के बाद से चीन में सबसे व्यापक और दीर्घकालिक हीटवेव को दर्ज किया गया और रिकॉर्ड के अनुसार यहाँ दूसरी सबसे शुष्क गर्मी थी।
    • यूरोप के बड़े हिस्से को बार-बार भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।
      • यूनाइटेड किंगडम ने 19 जुलाई, 2022 को रिकॉर्ड गर्मी का अनुभव किया जब वहाँ का तापमान पहली बार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये उठाए गए कदम:

  • राष्ट्रीय:
    • NAPCCC:
      • जलवायु परिवर्तन से उभरते खतरों का सामना करने के लिये भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC) जारी की। इसमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन आदि सहित 8 उप मिशन हैं।
    • इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान: यह शीतलक मांग में कमी लाने सहित शीतलक और संबंधित क्षेत्रों के लिये एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है। इससे उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी जिससे ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में मदद मिलेगी।
  • वैश्विक:
    • पेरिस समझौता:
      • इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना है, जबकि इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिये आवश्यक कदम उठाना है।
    • संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य:
      • सतत् विकास को प्राप्त करने के लिये इसके अंतर्गत 17 व्यापक लक्ष्य शामिल हैं। इनमें से लक्ष्य संख्या 13 , विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के समाधान पर केंद्रित है।
    • ग्लासगो संधि:
      • इसे अंततः COP26 वार्ता के दौरान वर्ष 2021 में 197 सदस्यों द्वारा अपनाया गया था।
      • इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि 1.5 डिग्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिये मौजूदा दशक में इस दिशा में मज़बूत निर्णायक कार्रवाई करना आवश्यक है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO):

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) 192 देशों की सदस्यता वाला एक अंतर-सरकारी संगठन है।
    • भारत विश्व मौसम विज्ञान संगठन का सदस्य देश है।
  • इसकी उत्पत्ति अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (IMO) से हुई है, जिसे वर्ष 1873 के वियना अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान कॉन्ग्रेस के बाद स्थापित किया गया था।
  • 23 मार्च, 1950 को WMO कन्वेंशन के अनुसमर्थन द्वारा स्थापित WMO, मौसम विज्ञान (मौसम और जलवायु), जल विज्ञान तथा इससे संबंधित भू-भौतिकीय विज्ञान हेतु संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी बन गई है।
  • WMO का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।

आगे की राह

  • ऐसी महत्त्वपूर्ण नीतियों और उपायों से संबंधित प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो संसाधनों के उत्पादन और उपभोग के तरीके को तीव्रता से बदल सकते हैं।
  • लोगों के साथ साझेदारियों वाले दृष्टिकोण को प्रमुखता देना चाहिये जिससे न केवल नौकरियाँ सृजित होने के साथ संसाधनों तक सुलभ पहुँच होगी बल्कि स्वच्छ और हरित वातावरण का भी विकास होगा।

Monday, November 7, 2022

November 07, 2022

बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों की होगी नियुक्ति

बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों की होगी नियुक्ति

प्रिलिम्स के लिये:

बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (CWPO), राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR), यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015, बाल यौन शोषण।

मेन्स के लिये:

बाल यौन शोषण से संबंधित मुद्दे और कदम उठाए जाने की ज़रूरत , बच्चों से संबंधित मुद्दे।

चर्चा में क्यों?

गृह मंत्रालय ने राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों से कहा है कि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) द्वारा जारी परामर्श के अनुसार, विशेषकर पीड़ित या अपराधी बच्चों की समस्या से निपटने के लिये प्रत्येक पुलिस थाने में एक बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (CWPO) नियुक्त करें।

  • इस परामर्श का कारण बच्चों के खिलाफ अपराधों में वृद्धि और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 का उल्लंघन है।

NCPCR द्वारा जारी परामर्श:

  • किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के प्रावधानों के अनुसार, कम-से- कम एक अधिकारी, जो सहायक उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, को प्रत्येक पुलिस स्टेशन में CWPO के रूप में नामित किया जाना चाहिये।
  • प्रत्येक ज़िले और शहर में एक विशेष किशोर पुलिस इकाई की स्थापना की जानी चाहिये, जिसका प्रमुख एक अधिकारी होगा जो पुलिस उपाधीक्षक के पद से नीचे का न हो।
    • इस इकाई में बाल कल्याण के क्षेत्र में काम करने का अनुभव रखने वाले CWPO और दो सामाजिक कार्यकर्त्ता शामिल होंगे, जिनमें से एक महिला होगी, जो बच्चों के संबंध में पुलिस के सभी कार्यों का समन्वय करेगी।
  • जनता से संपर्क करने के लिये CWPO के संपर्क विवरण सभी पुलिस थानों में प्रदर्शित किये जाने चाहिये।

भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों की स्थिति:

  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) द्वारा प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार, बच्चों के खिलाफ अपराधों की कुल संख्या वर्ष 2020 के 1,28,531 से बढ़कर वर्ष 2021 में 1,49,404 हो गई।
    • जबकि मध्य प्रदेश 19,173 मामलों के साथ देश में सबसे ऊपर है, उत्तर प्रदेश 16,838 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है।
  • देश भर में दर्ज किये गए 1,279 मामलों में कुल 1,402 बच्चों की हत्या की गई।
  • वर्ष 2021 में 1,18,549 बच्चों के अपहरण और व्यपहरण (Abduction) के 1,15,414 मामले दर्ज किये गए।
    • इन मामलों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश शीर्ष पर हैं।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR):

  • NCPCR का गठन मार्च 2007 में ‘कमीशंस फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स’ (Commissions for Protection of Child Rights- CPCR) अधिनियम, 2005 के तहत एक वैधानिक निकाय के रूप में किया गया ।
  • यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्यरत है।
  • आयोग का अधिदेश (mandate) यह सुनिश्चित करता है कि सभी कानून, नीतियाँ, कार्यक्रम और प्रशासनिक तंत्र भारत के संविधान में निहित बाल अधिकार के प्रावधानों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के बाल अधिकारों के अनुरूप भी हों।
  • यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (Right to Education Act, 2009) के तहत एक बच्चे की मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार से संबंधित शिकायतों की जाँच करता है।
  • यह लैंगिक अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 [Protection of Children from Sexual Offences(POCSO) Act, 2012] के कार्यान्वयन की निगरानी करता है।

किशोर न्याय (बालकों की देख-रेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015:

  • यह किशोर अपराध कानून एवं किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 को स्थानांतरित करता है।
  • यह अधिनियम जघन्य अपराधों में संलिप्त 16-18 वर्ष की आयु के बीच के किशोरों (जुवेनाइल) के ऊपर बालिगों के समान मुकदमा चलाने की अनुमति देता है।
  • इस अधिनियम में गोद लेने की प्रक्रिया को शामिल किया गया है। इस अधिनियम द्वारा हिंदू दत्तक ग्रहण व रख-रखाव अधिनियम (1956) और वार्ड के संरक्षक अधिनियम (1890) को अधिक सार्वभौमिक दत्तक कानून द्वारा स्थानांतरित किया गया है।
  • यह अधिनियम गोद लेने से संबंधित मामलों की देख-रेख के लिये केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (Central Adoption Resource Authority-CARA) नामक वैधानिक निकाय को प्रमुख बनाने के साथ अनाथ बच्चों के पालन-पोषण, देखभाल एवं उन्हें गोद देने की प्रणाली को और बेहतर बनाना सुनिश्चित करता है।

यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम, 2012:

  • यह बच्चों के हितों की रक्षा और भलाई के लिये बच्चों को यौन उत्पीड़न, दुर्व्याव्हार एवं अश्लील साहित्य के अपराधों से बचाने के लिये अधिनियमित किया गया था।
  • यह अठारह वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को बच्चे के रूप में परिभाषित करता है और बच्चे के स्वस्थ शारीरिक, भावनात्मक, बौद्धिक एवं सामाजिक विकास को सुनिश्चित करने के लिये हर स्तर पर बच्चे के सर्वोत्तम हित तथा कल्याण को सर्वोपरि मानता है।
  • यह यौन शोषण के विभिन्न रूपों को परिभाषित करता है, जिसमें सक्रिय और निष्क्रिय यौन शोषण के साथ ही अश्लीलता जैसे मामले शामिल हैं।
  • कुछ परिस्थितियों में यौन शोषण बढ़ जाते हैं, जैसे कि जब शोषण का सामना करने वाला बच्चा मानसिक रूप से बीमार होता है अथवा जब शोषण परिवार के किसी सदस्य, पुलिस अधिकारी, शिक्षक या डॉक्टर जैसे विश्वसनीय लोगों द्वारा किया जाता है।
  • यह जाँच प्रक्रिया के दौरान पुलिस को बाल संरक्षक की भूमिका भी प्रदान करता है।
  • अधिनियम में कहा गया है कि बाल यौन शोषण के मामले का निपटारा अपराध की रिपोर्ट की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया जाना चाहिये।
  • बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिये मृत्युदंड सहित कठोर सज़ा देने के लिये इसमें अगस्त 2019 में संशोधन किया गया था।

आगे की राह

  • समग्र ढाँचा: यह रिपोर्ट बच्चों के लिये सुरक्षित ऑनलाइन वातावरण बनाने तथा बच्चों को सुरक्षित रखने की भूमिका हेतु एक साथ काम करने के अलावा दुर्व्यवहार के खिलाफ रोकथाम गतिविधियों को प्राथमिकता देने का आह्वान करती है।
  • बहु हितधारक दृष्टिकोण: कानूनी ढाँचे, नीतियों, राष्ट्रीय रणनीतियों और मानकों के बेहतर कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिये माता-पिता, स्कूलों, समुदायों, NGO भागीदारों तथा स्थानीय सरकारों के साथ-साथ पुलिस व वकीलों को शामिल करने हेतु एक व्यापक आउटरीच प्रणाली विकसित किये जाने की आवश्यकता है।
November 07, 2022

UDISE प्लस रिपोर्ट

चर्चा में क्यों?

हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने स्कूली शिक्षा पर संयुक्त ज़िला शिक्षा सूचना प्रणाली प्लस (UDISE Plus) रिपोर्ट, 2021-22 जारी की है।


  • शिक्षा मंत्रालय ने वर्ष 2020-21 के लिये प्रदर्शन श्रेणी सूचकांक (PGI) भी जारी किया है।

UDISE Plus रिपोर्ट:

  • यह स्कूली छात्रों के नामांकन और स्कूल छोड़ने की दर, स्कूलों में शिक्षकों की संख्या एवं शौचालय, भवन तथा बिजली जैसी अन्य बुनियादी सुविधाओं के बारे में जानकारी प्रदान करने वाला एक समग्र अध्ययन है।
  • इसे वर्ष 2018-2019 में डेटा प्रविष्टि में तेज़ी लाने, त्रुटियों को कम करने, डेटा गुणवत्ता में सुधार करने और डेटा सत्यापन को आसान बनाने हेतु शुरु किया गया था।
  • यह स्कूल और उसके संसाधनों से संबंधित कारकों के विषय में विवरण एकत्र करने संबंधी एक एप्लीकेशन है।
  • यह UDISE का एक अद्यतित और उन्नत संस्करण है, जिसे शिक्षा मंत्रालय द्वारा वर्ष 2012-13 में शुरू किया गया था।

UDISE Plus रिपोर्ट, 2021-22 के निष्कर्ष:

  • नामांकन में गिरावट:
    • प्री-प्राइमरी स्तर पर:
      • वर्ष 2021-2022 में कुल 94.95 लाख छात्रों ने प्री-प्राइमरी कक्षाओं में प्रवेश लिया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10% की गिरावट को दर्शाता है (जब इन कक्षाओं में 1.06 करोड़ बच्चों ने प्रवेश लिया था)।
      • हालाँकि वर्ष 2020-2021 में प्री-प्राइमरी कक्षाओं में इससे पूर्व (1.35 करोड़) की तुलना में 21% की गिरावट दर्ज की गई थी क्योंकि महामारी व लॉकडाउन के परिणामस्वरूप स्कूल बंद हो गए थे तथा कक्षाएँ ऑनलाइन चल रही थीं।
    • प्राथमिक और उच्च माध्यमिक स्तर:
      • प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 5) में नामांकन में भी पहली बार गिरावट दर्ज की गई है, जो वर्ष 2020-2021 के 12.20 लाख से गिरकर वर्ष 2021-2022 में 12.18 लाख पर पहुँच गया है।
      • हालाँकि प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर पर छात्रों की कुल संख्या 19 लाख बढ़कर 25.57 करोड़ हो गई है।
  • स्कूलों की संख्या में गिरावट:
    • वर्ष 2020-21 के 15.09 लाख की तुलना में वर्ष 2021-22 में स्कूलों की कुल संख्या 14.89 लाख दर्ज की गई।
      • यह गिरावट मुख्य रूप से निजी और अन्य प्रबंधन स्कूलों के बंद होने तथा विभिन्न राज्यों द्वारा स्कूलों के समूह/क्लस्टरिंग के कारण दर्ज की गई।
    • वर्ष 2020-2021 में शिक्षकों की संख्या 96.96 लाख थी जो वर्ष 2021-2022 में 1.89 लाख की कमी के साथ 95.07 लाख दर्ज की गई गई।
  • कंप्यूटर सुविधाएँ और इंटरनेट तक पहुँच:
    • इसके अनुसार 44.75% स्कूलों में कंप्यूटर की सुविधा उपलब्ध होने के साथ केवल 33.9% स्कूलों की ही इंटरनेट तक पहुँच थी।
    • हालाँकि, पूर्व-कोविड की तुलना में इसमें सुधार दर्ज किया गया, जब केवल 38.5% स्कूलों में कंप्यूटर थे और 22.3% स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा थी।
  • सकल नामांकन अनुपात (GER):
    • यह शिक्षा के विशिष्ट स्तर में नामांकन की तुलना संबंधित आयु वर्ग की आबादी से करता ह1ै।
      • समग्र सुधार:
        • प्राथमिक कक्षाओं के लिये GER, वर्ष 2018-2019 के 101.3% से बढ़कर वर्ष 2021-2022 में 104.8% हो गया है।
        • यह माध्यमिक कक्षाओं के लिये वर्ष 2021-22 में 79.6%, वर्ष 2018-19 में 76.9% और उच्च माध्यमिक स्तर के लिये 50.14% से बढ़कर 57.6% हो गया है।
      • श्रेणी-वार सुधार:
        • वर्ष 2020-21 में 4.78 करोड़ की तुलना में वर्ष 2021-22 में अनुसूचित जाति नामांकन की कुल संख्या बढ़कर 4.82 करोड़ हो गई।
        • वर्ष 2020-21 के 2.49 करोड़ से वर्ष 2021-22 में कुल अनुसूचित जनजाति नामांकन बढ़कर 2.51 करोड़ हो गया।
        • कुल अन्य पिछड़े छात्र भी वर्ष 2021-22 में बढ़कर 11.48 करोड़ हो गए, जो वर्ष 2020-21 में 11.35 करोड़ थे।
        • वर्ष 2020-21 के 21.91 लाख की तुलना में वर्ष 2021-22 में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों (CWSN) का कुल नामांकन 22.67 लाख है।
  • लैंगिक समानता सूचकांक (GPI):
    • वर्ष 2021-22 में 12.29 करोड़ से अधिक लड़कियों ने प्राथमिक से उच्च माध्यमिक में दाखिला लिया है, जो वर्ष 2020-21 में लड़कियों के नामांकन की तुलना में 8.19 लाख की वृद्धि दर्शाता है।
      • GER का लिंग समानता सूचकांक (GPI) स्कूल में लड़कियों के प्रतिनिधित्व को उनकी जनसंख्या के संबंध में संबंधित आयु वर्ग में दर्शाता है।

प्रदर्शन श्रेणी सूचकांक (Performance Grading Index):

  • परिचय:
    • यह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में स्कूली शिक्षा प्रणाली का साक्ष्य-आधारित व्यापक विश्लेषण प्रदान करता है।
    • यह सूचकांक राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को कुल 1,000 अंकों में से उनके स्कोर के आधार पर 10 ग्रेड्स में वर्गीकृत करता है।
      • उच्चतम प्राप्त करने योग्य ग्रेड स्तर 1 है, जो कुल 1000 अंकों में से 950 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के लिये है।
      • निम्नतम ग्रेड स्तर 10 है जो 551 से नीचे के स्कोर के लिये है।
    • उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन पाँच डोमेन में कुल 70 संकेतकों पर किया जाता है।
      • पाँच डोमेन- लर्निंग आउटकम, पहुँच, बुनियादी ढाँचे और सुविधाएँ, इक्विटी एवं शासन प्रक्रिया हैं।
    • यह सूचकांक कई डेटा स्रोतों से लिये गए डेटा पर आधारित है, जिसमें यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) 2020-21, राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (NAS)-2017, और मिड डे मील पोर्टल शामिल हैं।
  • उद्देश्य:
    • साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को बढ़ावा देना और सभी के लिये उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा उपलब्ध कराने हेतु पाठ्यक्रम में सुधार पर ज़ोर देना PGI के मुख्य लक्ष्य हैं।
    • आशा की जाती है कि PGI राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को उनकी कमियों को दूर करने में मदद करेगा एवं तदानुसार हस्तक्षेप के लिये क्षेत्रों को प्राथमिकता देगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि स्कूली शिक्षा प्रणाली हर स्तर पर मज़बूत हो।

प्रदर्शन ग्रेडिंग सूचकांक के जाँच-परिणाम:

  • लेवल 2 प्राप्त करने वाले राज्य:
    • कुल 7 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश जिनमे केरल, पंजाब, चंडीगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान व आंध्र प्रदेश शामिल हैं, ने वर्ष 2020-21 में लेवल II (स्कोर 901-950) हासिल किया है। जबकि वर्ष 2017-18 में ऐसे राज्यों की संख्या नगण्य थी और वर्ष 2019-20 में 4 ही ऐसे राज्य थे।
      • गुजरात, राजस्थान और आंध्र प्रदेश अब तक किसी भी राज्य द्वारा उच्चतम स्तर की श्रेणी में प्रवेश करने वाले राज्यों में नए हैं।
  • लेवल 3 प्राप्त करने वाले राज्य:
    • दिल्ली, तमिलनाडु, कर्नाटक और ओडिशा सहित कुल 12 राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों ने 851-900 के बीच स्कोर के साथ स्तर 3 प्राप्त किया।
  • सबसे बड़ी उपलब्धि:
    • लद्दाख में वर्ष 2019-2020 के लेवल 10 से वर्ष 2020-2021 में लेवल 4 तक पहुँचने के रूप में सबसे बड़ा सुधार देखा गया है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली की स्थिति:

  • परिचय:
    • PGI के अनुसार, भारतीय शिक्षा प्रणाली लगभग 14.9 लाख विद्यालयों, 95 लाख शिक्षकों और लगभग 26.5 करोड़ छात्रों के साथ दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है।
    • शिक्षा की वर्तमान स्थिति के समक्ष बड़ी चुनौतियों के अंतर्गत पर्याप्त बुनियादी ढाँचा की कमी, शिक्षा पर कम सरकारी खर्च (जीडीपी के 3.5 फीसदी से भी कम) आदि है।
  • संबंधित पहलें:
    • नेशनल प्रोग्राम ऑन टेक्नोलॉजी एन्हांस्ड लर्निंग
    • सर्व शिक्षा अभियान (SSA)
    • प्रज्ञाता
    • मध्याह्न भोजन योजना
    • बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ
    • पीएम श्री स्कूल (PM SHRI Schools)

Sunday, November 6, 2022

November 06, 2022

टू फिंगर टेस्ट

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि कथित बलात्कार पीड़ितों का 'टू-फिंगर टेस्ट' कराने वालों को कदाचार का दोषी ठहराया जाएगा।

टू फिंगर टेस्ट:

  • परिचय:
    • चिकित्सक द्वारा किये जाने वाले टू-फिंगर टेस्ट में पीड़िता के जननांगों की संसर्ग संबंधी अभ्यास की जाँच की जाती है।
      • यह अभ्यास अवैज्ञानिक है और कोई विशिष्ट जानकारी प्रदान नहीं करता है। इसके अलावा ऐसी 'सूचना/जानकारी' का बलात्कार के आरोप से कोई लेना-देना नहीं है।
    • महिला जिसका यौन उत्पीड़न हुआ है, उसके स्वास्थ्य और चिकित्सीय ज़रूरतों का पता लगाने, साक्ष्य एकत्र करने आदि के लिये उसे चिकित्सीय परीक्षण से गुज़रना पड़ता है।
    • यौन उत्पीड़न पीड़ितों के मामलों से निपटने के लिये विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा जारी एक पुस्तिका कहती है, "कौमार्य (या 'टू-फिंगर') परीक्षण के लिये कोई जगह नहीं है, इसकी कोई वैज्ञानिक वैधता नहीं है।"
  • सर्वोच्च न्यायालय का अवलोकन:
    • वर्ष 2004 में सर्वोच्च न्यायालय की एकल बेंच ने महिलाओं के एक्टिव और पैसिव इंटरकोर्स को आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) के तत्त्वों को लागू करने के आलोक में अप्रासंगिक माना।
    • न्यायालय ने कहा कि जब कोई महिला बलात्कार का आरोप लगाती है तो उसे, उसके यौन रूप से सक्रिय होने के कारण बलात्कार न मानना पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण का प्रतीक है।
    • मई 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि टू फिंगर टेस्ट किसी महिला के निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है और सरकार से यौन शोषण की पुष्टि के लिये बेहतर चिकित्सा प्रक्रिया प्रदान करने हेतु आग्रह किया था।
    • आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय अभिसमय, 1966 तथा अपराध के शिकार एवं शक्ति के दुरुपयोग के पीड़ितों के लिये न्याय के बुनियादी सिद्धांतों की संयुक्त राष्ट्र घोषणा 1985 का आह्वान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि बलात्कार पीड़ित कानूनी सहायता की हकदार हैं क्योंकि इससे उन्हें नुकसान पहुँचने के साथ इनकी शारीरिक या मानसिक अखंडता और गरिमा पर आघात होता है।
    • अप्रैल 2022 में मद्रास उच्च न्यायालय ने राज्य को टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया था।

सरकार के दिशा-निर्देश:

  • त्वरित सुनवाई के लिये आपराधिक कानून में संशोधन और यौन उत्पीड़न के मामलों में बढ़ी सज़ा पर विचार हेतु गठित जस्टिस वर्मा समिति, 2013 की रिपोर्ट के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वर्ष 2014 की शुरुआत में यौन उत्पीड़न के शिकार लोगों की चिकित्सा जाँच हेतु विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये।
  • दिशानिर्देशों के अनुसार, बलात्कार/यौन हिंसा को स्थापित करने के लिये 'टू-फिंगर टेस्ट' नहीं किया जाना चाहिये।
  • दिशानिर्देशों में कहा गया है कि किसी भी मेडिकल जाँच के लिये बलात्कार पीड़िता (या उसके अभिभावक, यदि वह नाबालिग/मानसिक रूप से विकलांग है) की सहमति आवश्यक है। सहमति न देने पर भी पीड़िता को आवश्यक इलाज की सुविधा मुहैया कराई जाती है।
  • हालाँकि ये दिशानिर्देश मात्र हैं कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं।

आगे की राह

  • स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी दिशा-निर्देशों को निजी एवं सरकारी अस्पतालों में परिचालित किया जाना चाहिये।
  • बलात्कार पीड़िताओं का परीक्षण किये जाने से रोकने हेतु स्वास्थ्य प्रदाताओं के लिये कार्यशालाएँ आयोजित की जानी चाहिये।
  • इस मुद्दे को डॉक्टरों और पुलिसकर्मियों दोनों के व्यापक संवेदीकरण एवं प्रशिक्षण द्वारा संबोधित किया जा सकता है।

Friday, August 5, 2022

August 05, 2022

International Tiger Day

29 जुलाईः International Tiger Day
विश्व भर में हर साल 29 जुलाई को अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह दिवस जागरूकता दिवस के तौर पर भी मनाया जाता है. विभिन्न देशों में अवैध शिकार एवं वनों के नष्ट होने के वजह से बाघों की संख्या में काफी गिरावट आई है.

विश्व भर में इस दिन बाघों के संरक्षण से सम्बंधित जानकारियों को साझा किया जाता है और इस दिशा में जागरुकता अभियान चलाया जाता है. विश्वभर में बाघों के संरक्षण को ध्यान में रखते हुए एक दिन बाघों के नाम समर्पित किया जाता है.

इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य जंगली बाघों के निवास के संरक्षण और विस्तार को बढ़ावा देने के साथ बाघों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. इनकी तेजी से कम हो रही संख्या को नियंत्रित करना बहुत ज़रूरी है, नहीं तो ये खत्म हो जाएंगे. इस खास दिन का मकसद बाघों के संरक्षण को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करना है.

विश्व में बाघों की लगभग 70 फीसदी आबादी भारत में रहती है. देश में 2967 बाघ हैं, जबकि पूरी दुनिया में केवल 3900 बाघ ही बचे हैं. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने ‘विश्व बाघ दिवस’ की पूर्व संध्या पर 28 जुलाई 2020 को बाघ गणना रिपोर्ट, 2018 जारी की. उन्होंने बताया कि साल 1973 में हमारे देश में सिर्फ 9 टाइगर रिजर्व थे. अब इनकी संख्या बढ़कर 50 हो गई है.

केंद्रीय मंत्री जावड़ेकर ने कहा कि भारत को अपनी बाघ संपदा पर गर्व है. हम बाघों के संरक्षण को लेकर 12 टाइगर रेंज देशों के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के अनुसार, देश में 30 हजार हाथी, तीन हजार एक सींग वाले गेंडे और 500 से ज्यादा शेर हैं.

विश्व में भारत के अतिरिक्त बांग्लादेश, भूटान, कंबोडिया, चीन, इंडोनेशिया, लाओ पीडीआर, मलयेशिया, म्यांमार, नेपाल, रूस, थाईलैंड और वियतनाम में बाघ पाए जाते हैं.

भारत के 20 राज्यों में कुल 2,967 बाघ हैं. इनमें से 1,492 बाघ मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तराखंड में हैं. यानी केवल तीन राज्यों में ही देश में बाघों की कुल आबादी के 50 प्रतिशत से ज्यादा बाघ रहते हैं. बिहार में टाइगर की जनसँख्या 2010 में 8 थी जो 2018 में बढ़कर 31 हो गई. केरल में साल 2010 में 71 बाघ थे, जो साल 2018 में 190 हो गए है.

बाघों की आबादी में कमी की मुख्य वजह मनुष्यों द्वारा शहरों और कृषि का विस्तार ही इसका मुख्य कारण है. इस विस्तार के वजह से बाघों का 93 प्रतिशत प्राकृतिक आवास खत्म हो चुका है. बाघों की अवैध शिकार भी एक बहुत बड़ी वजह है जिसकी वजह से बाघ अब अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के विलुप्तप्राय श्रेणी में आ चुके हैं.

अंतरराष्ट्रीय बाघ दिवस 29 जुलाई को मनाने का फैसला साल 2010 में सेंट पिट्सबर्ग बाघ समिट में लिया गया था क्योंकि तब जंगली बाघ विलुप्त होने के कगार पर थे. इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले 13 देशों ने वादा किया था कि साल 2022 तक वे बाघों की आबादी दुगुनी कर देंगे.

भारत का राष्ट्रीय पशु बाघ को कहा जाता है. बाघ देश की शक्ति, शान, सतर्कता, बुद्धि तथा धीरज का प्रतीक है. बाघ भारतीय उपमहाद्वीप का प्रतीक है. यह उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र को छोड़कर पूरे देश में पाया जाता है. विश्वभर में बाघों की कई तरह की प्रजातियां मिलती हैं. इनमें 6 प्रजातियां मुख्य हैं. इनमें साइबेरियन बाघ, बंगाल बाघ, इंडोचाइनीज बाघ, मलायन बाघ, सुमात्रा बाघ तथा साउथ चाइना बाघ शामिल हैं.

Friday, March 18, 2022

March 18, 2022

भारत की सौर क्षमता स्थिति

 भारत की सौर क्षमता स्थिति

चर्चा में क्यों?

वर्ष 2021 में भारत ने अपनी संचयी स्थापित क्षमता में रिकॉर्ड 10 गीगावाट (GW) सौर ऊर्जा की वृद्धि की।

  • यह वृद्धि 12 महीनों के दौरान उच्चतम क्षमता वृद्धि रही है, इसके साथ ही सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वर्ष-दर-वर्ष लगभग 200% की वृद्धि दर्ज की गई है।
  • अब (28 फरवरी, 2022 तक) भारत 50 GW संचयी स्थापित सौर क्षमता से आगे निकल गया है।
  • 50 GW स्थापित सौर क्षमता में से 42 GW ग्राउंड-माउंटेड सोलर फोटोवोल्टिक (PV) सिस्टम से प्राप्त होती है और केवल 6.48 GW रूफ-टॉप सोलर (RTS) से तथा 1.48 GW सोलर PV के अन्य तरीकों से प्राप्त होती है।

उपलब्धि का महत्त्व:

  • यह वर्ष 2030 तक अक्षय ऊर्जा से 500 GW ऊर्जा (जिसमें से सौर ऊर्जा के क्षेत्र से 300 गीगावाट ऊर्जा प्राप्त किये जाने की उम्मीद है) के उत्पादन में भारत की यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
  • ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के बाद भारत सौर ऊर्जा विस्तार के मामले में पाँचवें स्थान पर आ गया है और यह 709.68 GW की वैश्विक संचयी क्षमता में लगभग 6.5% का योगदान देता है।

रूफ-टॉप सोलर इंस्टालेशन में भारत क्यों पिछड़ रहा है?

  • विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा का लाभ उठाने में विफल:
    • बड़े पैमाने पर सोलर फोटोवोल्टिक (Solar PV) पर ध्यान केंद्रित करने के कारण भारत विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा (DRE) विकल्पों के कई लाभों का फायदा उठाने में विफल रहा है, जिसमें ट्रांसमिशन और वितरण (T&D) घाटे में कमी शामिल है।
  • सीमित वित्तपोषण:
    • सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम प्रौद्योगिकी के प्राथमिक लाभों में से एक है, इसे ऊर्जा खपत के रूप में स्थापित करके बड़े पूंजी-गहन संचरण बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता को कम किया जा सकता है।
      • भारत को बड़े और छोटे दोनों पैमाने पर सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम को स्थापित करने के साथ-साथ विशेष रूप से RTS प्रयासों का विस्तार करने की ज़रूरत है।
    • हालाँकि आवासीय उपभोक्ताओं और छोटे एवं मध्यम उद्यम (SMEs) जो RTS स्थापित करना चाहते हैं, के लिये वित्तपोषण सीमित है। 
  • विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMS) की उदासीन प्रतिक्रियाएँ:
    • नेट मीटरिंग आरटीएस को समर्थन देने के लिये बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMS) की रुचि में कमी देखने को मिल रही है।

भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के समक्ष चुनौतियाँ: 

  • स्थापित सौर क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद देश के बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा का योगदान उसी गति से नहीं बढ़ा है
  • उदाहरण के लिये वर्ष 2019-20 में सौर ऊर्जा ने भारत की कुल 1390 BU बिजली उत्पादन में केवल 3.6% (50 बिलियन यूनिट) का योगदान दिया।
  • उपयोगिता-पैमाने पर सोलर PV क्षेत्र को भूमि लागत, उच्च T&D नुकसान और अन्य अक्षमताओं तथा ग्रिड एकीकरण जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
  • स्थानीय समुदायों और जैवविविधता संरक्षण मानदंडों के बीच भी टकराव की स्थिति रही है। इसके अलावा भले ही भारत ने यूटिलिटी-स्केल सेगमेंट में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिये रिकॉर्ड कम टैरिफ हासिल किया है लेकिन इससे अंतिम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली सुलभ नहीं हुई है।
  • अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) का अनुमान है कि सोलर PV अपशिष्ट से पुनर्प्राप्त करने योग्य सामग्रियों का वैश्विक मूल्य 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है।
  • वर्तमान में केवल यूरोपीय संघ ने सोलर PV अपशिष्ट के प्रबंधन में निर्णायक कदम उठाए हैं
  • भारत विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के आसपास उपयुक्त दिशा-निर्देश विकसित करने पर विचार कर सकता है, जिसका अर्थ है कि सौर पीवी उत्पादों के समग्र जीवन चक्र के लिये निर्माताओं को उत्तरदायी बनाया जाएगा और अपशिष्ट पुनर्चक्रण हेतु मानक विकसित किये जाएंगे।
    • यह घरेलू निर्माताओं को प्रतिस्पर्द्धा में बढ़त दे सकता है और अपशिष्ट प्रबंधन एवं आपूर्ति पक्ष की बाधाओं को दूर करने में महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

भारत की घरेलू सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता की मौजूदा स्थिति:

  • सौर क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता देश में सौर ऊर्जा की वर्तमान संभावित मांग के अनुरूप नहीं है।
    • भारत में सौर सेल उत्पादन के लिये 3 गीगावाट क्षमता और सौर पैनल उत्पादन क्षमता के लिये 8 गीगावाट क्षमता थी। इसके अलावा सौर मूल्य शृंखला में एकीकरण का अभाव है, क्योंकि भारत में सौर वेफर्स और पॉलीसिलिकॉन के निर्माण की कोई क्षमता नहीं है।
    • वर्ष 2021-22 में भारत ने अकेले चीन से लगभग 76.62 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के सौर सेल और मॉड्यूल आयात किये, जो उस वर्ष भारत के कुल आयात का 78.6% था।
    • कम विनिर्माण क्षमता और चीन से सस्ते आयात ने भारतीय उत्पादों को घरेलू बाज़ार में गैर-प्रतिस्पर्द्धी बना दिया है।
  • हालाँकि यदि भारत सौर प्रणालियों के लिये एक ‘सर्कुलर अर्थव्यवस्था मॉडल’ को अपनाता है, तो इस स्थिति में आसानी से सुधार किया जा सकता है। 
    • इससे सोलर पीवी वेस्ट को सोलर पीवी सप्लाई चेन में रिसाइकिल और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा। अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 के अंत तक भारत लगभग 34,600 मीट्रिक टन सौर पीवी कचरे का उत्पादन करेगा।

आगे की राह

  • सरकारों, विभिन्न इकाइयों/यूटिलिटीज़ और बैंकों को ऐसे नवीन वित्तीय तंत्रों की तलाश करने की आवश्यकता होगी जो ऋण की लागत में कमी और उधारदाताओं के लिये निवेश के जोखिम को कम करते हों।
  • जागरूकता में वृद्धि और RTS परियोजनाओं के लिये किफायती वित्त संभावित रूप से देश भर में SMEs और घरों में RTS का प्रसार सुनिश्चित कर सकता है।
  • छत के रिक्त स्थान का उपयोग करने से RTS स्थापित करने की समग्र लागत को कम करने और अर्थव्यवस्था के परिमाणात्मक विकास को सक्षम करने में मदद मिल सकती है।
  • वर्ष 2015 में पक्षकारों के सम्मेलन (COP-21) में भारत और फ्राँस द्वारा स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के माध्यम से एक प्रभावशाली घरेलू ट्रैक रिकॉर्ड के अलावा ऐसे मुद्दों पर सौर ऊर्जा पर निवेश जुटाने, क्षमता निर्माण, कार्यक्रम का समर्थन करने व विश्लेषण जैसी सहयोग सुविधाएँ प्रदान करने के लिये देशों को एक साथ लाने हेतु एक वैश्विक मंच भी उपलब्ध है।
  • भविष्य में प्रौद्योगिकी साझाकरण और वित्त भी ISA के महत्त्वपूर्ण पहलू बन सकते हैं, जिससे सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देशों के बीच सार्थक सहयोग की अनुमति मिल सकती है।

Thursday, March 17, 2022

March 17, 2022

असमानता को समाप्त करना

 यह एडिटोरियल 31/01/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “Show Commitment to Equity in the Budget” लेख पर आधारित है। इसमें ‘ऑक्सफैम इनइक्वेलिटी रिपोर्ट’ के प्रमुख निष्कर्षों और भारत में सामाजिक-आर्थिक असमानता की समस्याओं के संबंध में चर्चा की गई है।

संदर्भ

हाल ही में ऑक्सफैम इंटरनेशनल (Oxfam International) ने ‘Inequality Kills’ नामक शीर्षक से वार्षिक वैश्विक असमानता रिपोर्ट (Global Inequality Report) जारी की है, जिससे कुछ लोगों की संपत्ति में तो भारी वृद्धि लेकिन लाखों कामकाजी लोगों में व्याप्त दरिद्रता की तस्वीर सामने आई है। रिपोर्ट के निष्कर्ष भारत के लिये निराशाजनक हैं। गरीबों और वंचितों की रक्षा के लिये भारत द्वारा अनुपालित एक अधिकार-आधारित ढाँचे के माध्यम से असमानता की समस्या को दूर किया जा सकता है। समानता के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का एक प्रमुख माध्यम केंद्रीय बजट है और प्रत्येक केंद्रीय एवं राज्य बजट के प्रस्तुत किये जाने से पहले और उसके बाद असमानता पर विचार किया जाना चाहिये।

भारत में असमानता

  • असमानता को दूर करने से संबंधित संवैधानिक प्रावधान: भारत में असमानता को कम करने के लिये संवैधानिक अधिदेश प्रदान किया गया है। राज्य की नीति के निदेशक तत्व (Directive Principles of State Policy- DPSP) के अनुच्छेद 38 और 39 इस दृष्टिकोण से एक नीति पथ प्रदान करते हैं।
    • अनुच्छेद 38(1): ‘‘राज्य ऐसी सामाजिक व्यवस्था की, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे, भरसक प्रभावी रूप में स्थापना और संरक्षण करके लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा।’’
    • अनुच्छेद 39 (c): राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया इस प्रकार संचालन करेगा कि आर्थिक व्यवस्था सुनिश्चित रूप से इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिये अहितकारी संकेंद्रण न हो।
  • ऑक्सफैम रिपोर्ट के भारत विशिष्ट निष्कर्ष:
    • धन की असमानता: रिपोर्ट से पता चलता है कि कोविड-19 महामारी के दौरान विश्व के आधे से अधिक नई गरीबी का सृजन भारत में हुआ, 84% भारतीय परिवारों को आय का नुकसान हुआ और 4.6 करोड़ लोग चरम निर्धनता की चपेट में आ गए हैं।
      • इसी अवधि में सर्वाधिक अमीर 142 लोगों की संपत्ति में दोगुनी वृद्धि हुई और यह 53 लाख करोड़ रुपए से अधिक हो गया।
    • सामाजिक सुरक्षा व्यय में गिरावट: भारत में जारी कोविड के कहर के बीच देश के स्वास्थ्य बजट में वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान से 10% की गिरावट देखी गई।
      • सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के लिये बजटीय आवंटन कुल केंद्रीय बजट के 1.5% से घटकर 0.6% रह गया।
    • बढ़ता राजकोषीय घाटा: पिछले वर्ष (2020) निवेश आकर्षित करने के लिये कॉर्पोरेट करों को 30% से घटाकर 22% करने के परिणामस्वरूप 1.5 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ, जिसने भारत के राजकोषीय घाटे में वृद्धि में योगदान किया।
  • असमानता के कारक:
    • बजटीय गिरावट: भारत विश्व के उन कुछ देशों में से एक है, जहाँ कोविड महामारी के दौरान स्वास्थ्य बजट में गिरावट आई। वर्ष 2021 में तो इसमें 10% की भारी गिरावट देखी गई।
      • सामाजिक सुरक्षा व्यय वर्ष 2020-21 में 1.5%, जो पहले ही अत्यंत कम था, से घटकर वर्ष 2021-22 के केंद्रीय बजट का मात्र 0.6% रह गया।
        • बजट आवंटन की इस स्थिति में आम लोग बेहद बुनियादी सेवाओं और अधिकारों से भी वंचित हुए हैं और जीवित रहने में असमर्थ हैं।
      • महामारी के पहले चरण में आवंटन बढ़ाने के बाद भी इन्हें जारी नहीं किया गया और बजट 2021-22 में आवंटन में कटौती कर दी गई।
    • वेतन और भत्तों में असमानता: वृद्धों, विकलांगों और विधवाओं के लिये सामाजिक सुरक्षा पेंशन लगभग 15 वर्षों से 200- 300 रुपए प्रति माह पर ही रुकी हुई है, जबकि इसके विपरीत नीति निर्माताओं के वेतन और पेंशन में वृद्धि की गई है।
      • केंद्र सरकार के 1 करोड़ कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिये वृद्धि से सरकारी खजाने को 3.3 करोड़ लाभार्थियों के लिये कुल सामाजिक सुरक्षा पेंशन बजट की तुलना में अधिक बोझ का वहन करना पड़ा है।
    • सब्सिडीयुक्त खाद्यान्न की अनुपलब्धता: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act- NFSA) के तहत परिवारों की प्राथमिकता सूची को वर्ष 2011 की जनगणना से निर्धारित प्रतिशत के आधार पर एक नियत संख्या में रखा गया  है।
      • पिछले 11 वर्षों में लगभग 10 करोड़ पात्र लाभार्थियों की जनसंख्या वृद्धि को लाभ के दायरे से बाहर रखा गया है।
      • इस प्रकार लगभग कानूनी रूप से हकदार  12%लोग (यहाँ तक कि मौजूदा ‘प्राथमिकता परिवार’ के बच्चों तक को) सब्सिडीयुक्त खाद्यान्न प्राप्त कर सकने में असमर्थ हैं।
    • शिक्षा तक असमान पहुँच: महामारी ने बच्चों की एक ऐसी पीढ़ी भी पैदा कर दी है जो औपचारिक शिक्षा को भूल चुके हैं। गरीब परिवारों के कई किशोर पहले ही शिक्षा छोड़ कार्यबल में शामिल होने को विवश हुए हैं।
      • इस अवधि में शिक्षा बजट में 6% की कटौती की गई है। बजट में कटौती के साथ ही ऑनलाइन शिक्षण पर निर्भरता स्थानिक बहुआयामी गरीबी के संस्थानीकरण के समान है।

आगे की राह

  • असमानता से निपटने के लिये बहुआयामी दृष्टिकोण: राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जैसे कार्यक्रमों को आवश्यक आवंटन की मात्रा प्राप्त करनी चाहिये। इसके साथ ही पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी (PAEG) ने अनुमान लगाया है कि वर्तमान में सक्रिय जॉब कार्ड्स के लिये 100 दिनों के काम की गारंटी सुनिश्चित करने के लिये लगभग 2,64,000 करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी।
    • सामाजिक सुरक्षा पेंशनभोगियों को भूख, बीमारी और गरीबी से बचाने की ज़रूरत है। चुनावी मौसम असंगठित और कमज़ोर लोगों के मूल अधिकारों को बहाल करने का एक अवसर प्रदान करता है।
  • कर से प्राप्ति: सभी सरकारों को इस महामारी अवधि के दौरान अत्यधिक अमीर (सुपर-रिच) लोगों द्वारा अर्जित लाभ पर तुरंत करारोपण करना चाहिये।
    • सामाजिक क्षेत्र में सक्रिय 30 संगठनों के नेटवर्क ‘जन सरोकर’ ने सुझाव दिया है कि आबादी के शीर्ष 1% पर 2% संपत्ति कर और 33% उत्तराधिकार कर से लगभग 11 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष की प्राप्ति होगी जो बुनियादी सामाजिक क्षेत्र अधिकार के समर्थन में काम आ सकता है।
  • बुनियादी आवश्यकताओं की पहुँच बढ़ाना: यह तय करना आवश्यक है कि भारत में बढ़ती असमानता को देखते हुए सार्वजनिक नीति को अब कौन सी दिशा लेनी चाहिये । आवश्यकता है कि जनसंख्या के बीच स्वास्थ्य और शिक्षा को और अधिक व्यापक रूप से प्रसारित किया जाए।
    • सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा लाभ, रोज़गार गारंटी योजनाओं जैसी सार्वजनिक वित्तपोषित उच्च गुणवत्तायुक्त सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित कर असमानता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  • रोज़गार सृजन: भारत के श्रम प्रधान विनिर्माण क्षेत्र में उन लाखों लोगों को संलग्न कर सकने की क्षमता है जो खेती करना छोड़ रहे हैं, जबकि सेवा क्षेत्र शहरी मध्यम वर्ग को ही लाभान्वित करता रहा है।
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने भी अनुशंसा की है कि न्यूनतम वेतन सीमा इस तरह से निर्धारित की जानी चाहिये जो व्यापक आर्थिक कारकों के साथ श्रमिकों और उनके परिवारों की आवश्यकताओं को पूर्ण करे।

Wednesday, March 16, 2022

March 16, 2022

आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण

 

चर्चा में क्यों?

हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा जारी नवीनतम आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) से पता चलता है कि महामारी की पहली लहर के दौरान वर्ष 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन के कारण बेरोज़गारी दर में तेज़ी से वृद्धि हुई थी।

  • राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत सांख्यिकीय सेवा अधिनियम 1980 के तहत सरकार की केंद्रीय सांख्यिकीय एजेंसी है।

बेरोज़गारी दर क्या है?

  • बेरोज़गारी दर: बेरोज़गारी दर को श्रम बल में बेरोज़गार व्यक्तियों के प्रतिशत के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • श्रम बल: करेंट वीकली स्टेटस (CWS) के अनुसार, श्रम बल का आशय सर्वेक्षण की तारीख से पहले एक सप्ताह में औसत नियोजित या बेरोज़गार व्यक्तियों की संख्या से है।
  • CWS दृष्टिकोण: शहरी बेरोज़गारी PLFS, CWS के दृष्टिकोण पर आधारित है।
    • CWS के तहत एक व्यक्ति को बेरोज़गार तब माना जाता है यदि उसने सप्ताह के दौरान किसी भी दिन एक घंटे के लिये भी काम नहीं किया, लेकिन इस अवधि के दौरान किसी भी दिन कम-से-कम एक घंटे के लिये काम की मांग की या काम उपलब्ध था।
    • वर्ष 2021 की अप्रैल-जून तिमाही में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों के लिये शहरी क्षेत्रों में वर्तमान साप्ताहिक स्थिति में श्रम बल भागीदारी दर 46.8% थी।
    • आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS):

      • अधिक नियत समय अंतराल पर श्रम बल डेटा की उपलब्धता के महत्त्व को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने अप्रैल 2017 में आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) की शुरुआत की।
      • PLFS के मुख्य उद्देश्य हैं:
      • 'वर्तमान साप्ताहिक स्थिति' (CWS) में केवल शहरी क्षेत्रों के लिये तीन माह के अल्‍पकालिक अंतराल पर प्रमुख रोज़गार और बेरोज़गारी संकेतकों (अर्थात् श्रमिक-जनसंख्या अनुपात, श्रम बल भागीदारी दर, बेरोज़गारी दर) का अनुमान लगाना।
      • प्रतिवर्ष ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में सामान्य स्थिति (पीएस+एसएस) और CWS दोनों में रोज़गार एवं बेरोज़गारी संकेतकों का अनुमान लगाना।

      बेरोज़गारी से निपटने हेतु सरकार की पहल:

      • "स्माइल- आजीविका और उद्यम के लिये सीमांत व्यक्तियों हेतु समर्थन" (Support for Marginalized Individuals for Livelihood and Enterprise-SMILE)
      • पीएम-दक्ष (प्रधानमंत्री दक्ष और कुशल संपन्न हितग्राही) योजना
      • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (MGNREGA)
      • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY)
      • स्टार्टअप इंडिया योजना