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भीम बहादुर चौधरी

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Tuesday, November 8, 2022

November 08, 2022

लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता

लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता

यह एडिटोरियल 07/11/2022 को ‘द हिंदू’ में प्रकाशित “The Uniform Civil Code” लेख पर आधारित है। इसमें भारत में समान नागरिक संहिता (UCC) की संवैधानिकता और अन्य संबंधित मुद्दों के बारे में चर्चा की गई है।


संदर्भ:

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य है और इसका अर्थ यह है कि राज्य किसी धर्म विशेष का समर्थन नहीं करता है। धर्मनिरपेक्ष राज्य वह होता है जो धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद (अनुच्छेद 14-18) समता को और लैंगिक आधार पर गैर-भेदभाव को अनिवार्य बनाते हैं। हालाँकि, कई कानून मौजूद हैं जो स्पष्ट रूप से इन सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और विशेष रूप से कुछ समुदायों के पर्सनल लॉ (Personal laws) में बने रहे हैं, जहाँ ऐसे प्रावधान शामिल हैं जिन्हें महिलाओं के विरुद्ध अत्यधिक भेदभावपूर्ण माना जाता है।

भारतीय आबादी में लगभग आधी हिस्सेदारी के साथ महिलाएँ एक लैंगिक रूप से न्यायपूर्ण संहिता की माँग करती रही हैं ताकि वे भी समता और न्याय का उपभोग कर सकें, चाहे वे किसी भी समुदाय से संबंधित हों। लेकिन भारत में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code- UCC) के आदर्श को अभी तक हासिल नहीं किया जा सका है।

चूँकि समान नागरिक संहिता राजनीतिक रूप से एक संवेदनशील विषय है, हमारे संविधान निर्माता भी एक समझौते की स्थिति में रहे और इसे उन्होंने अनुच्छेद 44 के अंदर राज्य नीति के एक निदेशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया।

चूँकि भारत लैंगिक समता के लिये प्रयासरत है, देश के लिये UCC की प्रासंगिकता पर गहनता से विचार किया जाना आवश्यक है।

समान नागरिक संहिता क्या है?

  • राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत (DPSP) के अनुच्छेद 44 में कहा गया है कि पूरे देश में नागरिकों के लिये समान नागरिक संहिता (UCC) सुनिश्चित करना राज्य का कर्तव्य है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य भारत में प्रत्येक प्रमुख धार्मिक समुदाय के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों के आधार पर प्रचलित व्यक्तिगत कानूनों को प्रत्येक नागरिक को एकसमान रूप से नियंत्रित करने वाले नियमों के एक सामान्य समूह से प्रतिस्थापित करना है।
  • UCC में ‘यूनिफॉर्म’ या समान का अर्थ है:
    • समुदायों के बीच कानूनों की एकरूपता/एकसमता।
    • समुदायों के भीतर कानूनों की एकरूपता ताकि पुरुषों एवं महिलाओं के अधिकारों के बीच समानता सुनिश्चित हो।

भारत में UCC की दिशा में किये गए प्रमुख प्रयास

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954: वर्ष 1954 का विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act of 1954)किसी भी नागरिक के लिये, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, सिविल मैरेज का प्रावधान करता है; इस प्रकार, किसी भी भारतीय को किसी भी धार्मिक व्यक्तिगत कानून की सीमाओं के बाहर विवाह करने की अनुमति देता है।
  • शाह बानो केस, 1985: इस मामले में शाह बानो के भरण-पोषण के दावे को ठुकरा दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 (जो पत्नियों, बच्चों और माता-पिता के रखरखाव के संबंध में सभी नागरिकों पर लागू होता है) के तहत उसके पक्ष में निर्णय दिया था।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने यह अनुशंसा भी की थी कि लंबे समय से लंबित समान नागरिक संहिता को अंततः अधिनियमित किया जाना चाहिये।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने सरला मुद्गल मामले (1995) और पाउलो कॉटिन्हो बनाम मारिया लुइज़ा वेलेंटीना परेरा मामले (2019) में भी सरकार से UCC लागू करने का आह्वान किया।

UCC के पक्ष में तर्क

  • युवाओं की आकांक्षाओं को समायोजित करना: जैसे-जैसे दुनिया डिजिटल युग की ओर आगे बढ़ रही है, युवा आबादी की सामाजिक दृष्टि और आकांक्षा समानता, मानवता एवं आधुनिकता के सार्वभौमिक एवं वैश्विक सिद्धांतों से प्रेरित होकर आकार ग्रहण कर रही है।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता के अधिनियमन से राष्ट्र निर्माण की दिशा में उनकी पूरी क्षमता को साकार कर सकने में मदद मिलेगी।
  • राष्ट्रीय एकता का समर्थन: संविधान सभी नागरिकों को विधि न्यायालयों के समक्ष समान व्यवहार की गारंटी प्रदान करता है चाहे वह आपराधिक कानून हो या अन्य नागरिक कानून (व्यक्तिगत कानूनों को छोड़कर)।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन सभी के लिये समान व्यक्तिगत कानून प्रदान करेगा, जिसके परिणामस्वरूप भेदभाव या रियायतों के मुद्दों का राजनीतिकरण समाप्त हो जाएगा। यह समुदाय विशेष द्वारा उनके विशिष्ट धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के आधार पर उपभोग किये जाते असाधारण लाभ की स्थिति को भी समाप्त कर देगा।
  • पितृसत्तात्मक मानसिकता से ऊपर उठना: अधिकांश धर्मों के मौजूदा व्यक्तिगत कानून समाज के उच्चवर्गीय पितृसत्तात्मक अवधारणाओं पर आधारित हैं। इस प्रकार, समान नागरिक संहिता का संहिताकरण एवं कार्यान्वयन पितृसत्तात्मक रूढ़िवादिता की पवित्रता या स्वीकृति को नष्ट कर सकेगा।
    • इस प्रकार, समान नागरिक संहिता लैंगिक समानता को बढ़ावा देगी और पुरुषों एवं महिलाओं दोनों को बराबरी के स्तर पर लाएगी।
  • न्यायिक प्रक्रिया के लिये सुविधाजनक: देश में हिंदू संहिता, शरिया कानून आदि कई व्यक्तिगत कानून मौजूद हैं। इतने सारे कानूनों की उपस्थिति व्यक्तिगत मामलों के निर्णय में भ्रम, जटिलता और विसंगतियाँ उत्पन्न करती है, जिसके परिणामस्वरूप विलंबन या अपूर्ण न्याय की स्थिति भी बनती है।
    • UCC न्यायपालिका को कुशलतापूर्वक और उचित समय सीमा के भीतर न्याय कर सकने में सक्षम करेगी।

UCC के विरुद्ध तर्क

  • 21वीं विधि आयोग की रिपोर्ट: भारत के विधि आयोग का मत है कि देश में किसी समान नागरिक संहिता का होना व्यक्तिगत/पारिवारिक कानूनों में निहित संघर्षों को सुलझाने के लिये न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय।
    • आयोग ने कहा है कि कई देश अब विभिन्न समूहों में अंतर या विविधता को स्वीकार करने की ओर आगे बढ़ रहे हैं, और केवल अंतर का अस्तित्व में होना भेदभावपरक नहीं माना जा सकता, बल्कि यह तो एक मज़बूत लोकतंत्र का संकेतक है।
    • इसलिये, आयोग ने व्यक्तिगत कानूनों में व्याप्त भेदभाव एवं असमानता से निपटने के लिये मौजूदा पारिवारिक कानूनों में संशोधन का सुझाव दिया है, न कि उनके बीच अंतरों को पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाए।
  • सांस्कृतिक रूप से विविध भारत के प्रतिकूल: भारत में धर्मों, संप्रदायों, जातियों, राज्यों आदि में व्यापक विविधतपूर्ण संस्कृति के कारण विवाह जैसे व्यक्तिगत मुद्दों के लिये समान नियमों का एक समूह लागू कर सकता कठिन है और इसमें कई व्यावहारिक जटिलताएँ सामने आएँगी।
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अतिक्रमण: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-28 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करते हैं। समान नागरिक संहिता को कई समुदायों, विशेष रूप से अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा अपनी धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) के लिये एक खतरे के रूप में देखा जाता है ।
    • वे मानते हैं कि समान नागरिक संहिता उनकी परंपराओं की उपेक्षा करेगी और ऐसे नियम लागू करेगी जो मुख्य रूप से बहुसंख्यक धार्मिक समुदायों से प्रभावित होंगे।
  • जनजातियों के स्वदेशी अधिकारों के विरुद्धनगा समुदाय ने दावा किया है कि UCC के कार्यान्वयन से उनकी संस्कृति और गरिमा के लिये स्पष्ट अवरोध उत्पन्न हो सकते हैं।
    • यह संभावित रूप से सामाजिक अव्यवस्था का कारण बन सकता है, क्योंकि जनजातियों का व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन देश के अन्य लोगों से व्यापक रूप से अलग है।

निष्कर्ष

  • UCC के लक्ष्य को आदर्श रूप से एक सर्वव्यापक दृष्टिकोण के बजाय एक परत -दर-परत दृष्टिकोण के माध्यम से खंडों में प्राप्त किया जाना चाहिये। समान संहिता कोड की तुलना में एक न्यायसंगत संहिता का होना कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है।
  • समान नागरिक संहिता का खाका तैयार करते समय UCC की सामाजिक अनुकूलन क्षमता पर भी विचार करने की आवश्यकता है। चाहे सभी धर्मों के लिये एक ही कानून बनाया जाए या अलग-अलग धर्मों/समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों में सुधार किया जाए, वे लैंगिक न्याय पर आधारित होने चाहिये और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि हमारे संविधान में निहित समता का सिद्धांत बरकरार रहे।
  • सार यह है कि सरकार और समाज को एक समान नागरिक समाज की ओर आगे बढ़ने के लिये भरोसे का निर्माण करने की आवश्यकता है जहाँ मानवाधिकारों के प्रति का सम्मान हो और लैंगिक समानता को प्रोत्साहन दिया जाता हो। इस स्थिति का निर्माण किसी समान नागरिक संहिता से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

अभ्यास प्रश्न: भारत में समान नागरिक संहिता के महत्त्व और इसके कार्यान्वयन की राह की बाधाओं पर विचार कीजिये।

November 08, 2022

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022


प्रिलिम्स के लिये:

प्रोविज़नल स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, विश्व मौसम विज्ञान संगठन, ग्रीनहाउस गैसें

मेन्स के लिये:

बढ़ती आपदा से संबंधित मुद्दे और इस संबंध में कदम उठाने की ज़रूरत।

चर्चा में क्यों?

हाल ही में विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने प्रोविज़नल स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट, 2022 जारी की।

  • पूर्ण और अंतिम रिपोर्ट अप्रैल 2023 में प्रकाशित होने की उम्मीद है।

WMO स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट:

  • यह रिपोर्ट वार्षिक आधार पर तैयार की जाती है, जो छठी IPCC आकलन रिपोर्ट द्वारा प्रदान किये गए हाल के मूल्यांकन चक्र का पूरक है।
  • रिपोर्ट प्रमुख जलवायु संकेतकों और चरम घटनाओं एवं उनके प्रभावों पर रिपोर्टिंग का उपयोग करके जलवायु की वर्तमान स्थिति पर एक आधिकारिक सहयोग प्रदान करती है।

प्रमुख बिंदु

  • ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में वृद्धि:
    • तीन मुख्य ग्रीनहाउस गैसों- कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), मीथेन (CH4) और नाइट्रस ऑक्साइड (NO2) की सांद्रता वर्ष 2021 में रिकॉर्ड स्तर पर थी।
    • मीथेन, जो कि ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति उत्पन्न करने में कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक शक्तिशाली है, के उत्सर्जन में सबसे तेज़ गति से वृद्धि हुई है।
      • ग्लासगो में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में देशों ने वर्ष 2030 तक वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में कम-से-कम 30% की कटौती करने का संकल्प लिया था।
  • तापमान:
    • वर्ष 2022 में वैश्विक औसत तापमान वर्ष 1850-1900 औसत से लगभग 1.15 डिग्री सेल्सियस अधिक होने का अनुमान है।
    • वर्ष 2015 से 2022 तक आठ सबसे गर्म वर्ष रहने का अनुमान है।
    • ला नीना (भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के जल का ठंडा होना) की स्थिति वर्ष 2020 के अंत से प्रभावी है और वर्ष 2022 के अंत तक जारी रहने की उम्मीद है।
      • ला नीना ने पिछले दो वर्षों से निरंतर वैश्विक तापमान को अपेक्षाकृत कम किया है, फिर भी वर्ष 2011 में पिछले महत्त्वपूर्ण ला नीना की तुलना में यह अधिक है।
  • ग्लेशियर और बर्फ:
    • वर्ष 2022 में यूरोपीय आल्प्स में ग्लेशियर पिघलने का रिकॉर्ड टूट गया। पूरे आल्प्स में 3 और 4 मीटर से अधिक की औसत मोटाई के ग्लेशियर के नुकसान के साथ वर्ष 2003 के पिछले रिकॉर्ड की तुलना में यह काफी अधिक मापा गया है।
    • प्रारंभिक माप के अनुसार, स्विट्ज़रलैंड में वर्ष 2021 और 2022 के बीच ग्लेशियर की बर्फ 6% पिघल गई।
    • इतिहास में पहली बार उच्चतम माप स्थलों पर भी गर्मी के मौसम में बर्फ नहीं गिरी और इस प्रकार नवीन बर्फ का संचय नहीं हुआ।
  • समुद्र स्तर में वृद्धि:
    • उपग्रह altimeter रिकॉर्ड के 30 वर्षों (1993-2022) के दौरान वैश्विक औसत समुद्र स्तर में अनुमानित 3.4 ± 0.3 मिमी प्रतिवर्ष की वृद्धि हुई है।
    • वर्ष 1993-2002 और 2013-2022 के बीच यह दर दोगुनी हो गई है तथा जनवरी 2021 एवं अगस्त 2022 के बीच समुद्र के स्तर में लगभग 5 मिमी. की वृद्धि हुई है।
  • महासागरीय ऊष्मा:
    • मानव द्वारा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के परिणामस्वरूप संचित ऊष्मा का लगभग 90% समुद्र में जमा हो जाता है।
    • ऐसा पाया गया कि वर्ष 2021 में समुद्र के ऊपरी सतह से लेकर 2000 मीटर तक अभूतपूर्व स्तर तक गर्म हुआ।
    • कुल मिलाकर, समुद्री सतह के 55% हिस्से ने वर्ष 2022 में कम -से-कम एक समुद्री हीटवेव का अनुभव किया
    • जबकि समुद्र की सतह के केवल 22% हिस्से में ही समुद्री ठंड का अनुभव हुआ। शीत लहरों की तुलना में समुद्री हीटवेव लगातार अधिक होती जा रही है।
  • खराब मौसम:
    • विगत 40 वर्षों की तुलना में पूर्वी अफ्रीका में लगातार चार वर्षों से बारिश औसत से कम रही है जो इस बात का संकेत हो सकती है कि वर्तमान मौसम भी शुष्क हो सकता है।
    • जुलाई और अगस्त, 2022 में रिकॉर्ड तोड़ बारिश के कारण पाकिस्तान में बाढ़ की स्थिति बन गई ।
      • भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में मार्च और अप्रैल में हीटवेव के बाद बाढ़ आई थी।
    • उत्तरी गोलार्द्ध के बड़े हिस्से असाधारण रूप से गर्म और शुष्क रहे थे।
      • राष्ट्रीय रिकॉर्ड दर्ज किये जाने के बाद से चीन में सबसे व्यापक और दीर्घकालिक हीटवेव को दर्ज किया गया और रिकॉर्ड के अनुसार यहाँ दूसरी सबसे शुष्क गर्मी थी।
    • यूरोप के बड़े हिस्से को बार-बार भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।
      • यूनाइटेड किंगडम ने 19 जुलाई, 2022 को रिकॉर्ड गर्मी का अनुभव किया जब वहाँ का तापमान पहली बार 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुँच गया।

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये उठाए गए कदम:

  • राष्ट्रीय:
    • NAPCCC:
      • जलवायु परिवर्तन से उभरते खतरों का सामना करने के लिये भारत ने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिये राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAPCC) जारी की। इसमें राष्ट्रीय सौर मिशन, राष्ट्रीय जल मिशन आदि सहित 8 उप मिशन हैं।
    • इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान: यह शीतलक मांग में कमी लाने सहित शीतलक और संबंधित क्षेत्रों के लिये एक एकीकृत दृष्टिकोण प्रदान करता है। इससे उत्सर्जन को कम करने में मदद मिलेगी जिससे ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में मदद मिलेगी।
  • वैश्विक:
    • पेरिस समझौता:
      • इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखना है, जबकि इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिये आवश्यक कदम उठाना है।
    • संयुक्त राष्ट्र सतत् विकास लक्ष्य:
      • सतत् विकास को प्राप्त करने के लिये इसके अंतर्गत 17 व्यापक लक्ष्य शामिल हैं। इनमें से लक्ष्य संख्या 13 , विशेष रूप से जलवायु परिवर्तन के समाधान पर केंद्रित है।
    • ग्लासगो संधि:
      • इसे अंततः COP26 वार्ता के दौरान वर्ष 2021 में 197 सदस्यों द्वारा अपनाया गया था।
      • इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि 1.5 डिग्री के लक्ष्य को हासिल करने के लिये मौजूदा दशक में इस दिशा में मज़बूत निर्णायक कार्रवाई करना आवश्यक है।

विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO):

  • विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) 192 देशों की सदस्यता वाला एक अंतर-सरकारी संगठन है।
    • भारत विश्व मौसम विज्ञान संगठन का सदस्य देश है।
  • इसकी उत्पत्ति अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान संगठन (IMO) से हुई है, जिसे वर्ष 1873 के वियना अंतर्राष्ट्रीय मौसम विज्ञान कॉन्ग्रेस के बाद स्थापित किया गया था।
  • 23 मार्च, 1950 को WMO कन्वेंशन के अनुसमर्थन द्वारा स्थापित WMO, मौसम विज्ञान (मौसम और जलवायु), जल विज्ञान तथा इससे संबंधित भू-भौतिकीय विज्ञान हेतु संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी बन गई है।
  • WMO का मुख्यालय जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में है।

आगे की राह

  • ऐसी महत्त्वपूर्ण नीतियों और उपायों से संबंधित प्रयासों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है जो संसाधनों के उत्पादन और उपभोग के तरीके को तीव्रता से बदल सकते हैं।
  • लोगों के साथ साझेदारियों वाले दृष्टिकोण को प्रमुखता देना चाहिये जिससे न केवल नौकरियाँ सृजित होने के साथ संसाधनों तक सुलभ पहुँच होगी बल्कि स्वच्छ और हरित वातावरण का भी विकास होगा।

Friday, August 5, 2022

August 05, 2022

आयकर_विभाग

#आयकर_विभाग

* आयकर वह कर होता है जो सरकार लोगों की आय पर आय में से लेती है
* आयकर लेने वाले विभाग को आयकर विभाग कहते हैं
* जेम्स विल्सन की ओर से आयकर सबसे पहले 24 जुलाई 1860 को पेश किया गया था
* आयकर एक कर की सरकारों को अपने क्षेत्राधिकार के भीतर सभी संस्थाओं द्वारा उत्पन्न वित्तीय आय पर लागू होता है
* आयकर धन का एक महत्वपूर्ण स्रोत होता है जिसे सरकार अपनी गतिविधियों निधि और जनता की सेवा करने के लिए उपयोग करता है
* भारत सरकार व्यक्तियों, हिंदू अविभाजित परिवारों, कंपनियों, फर्मों, सहकारी समितियों और ट्रस्टों और किसी भी अन्य कृतिम व्यक्ति के कर योग्य आय पर आयकर लगाता है
* कर का भार प्रत्येक व्यक्ति पर अलग होता है यह उदग्रहण भारतीय आयकर अधिनियम 1961 द्वारा शासित है
* भारतीय आयकर विभाग केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा संचालित है
* भारतीय आयकर विभाग भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के अधीन राजस्व विभाग का हिस्सा है
* भारत का आयकर अधिनियम निम्न तत्वों / भागों से मिलकर बना है
> आयकर अधिनियम 1961 
> वित्त अधिनियम 
> आयकर नियमावली 
> परिपत्र / अधिसूचना 
> न्यायालय के विधायी निर्णय
* भारत में प्रतिवर्ष 24 जुलाई को आयकर दिवस मनाया जाता है
* वर्ष 2010 में पहली बार आयकर दिवस मनाया गया था
* पहले आयकर दिवस का आयोजन राजधानी दिल्ली में हुआ था इसमें वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यादगार बनाने के लिए डाक टिकट और सिक्के भी जारी किए थे
* आयकर दिवस के अवसर पर आयकर विभाग के अधिकारियों को सम्मानित किया जाता है
August 05, 2022

बॉम्बे_स्टॉक_एक्सचेंज (BSE)

#बॉम्बे_स्टॉक_एक्सचेंज (BSE)

* बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भारत और एशिया का सबसे पुराना स्टॉक एक्सचेंज है
* इसकी स्थापना 9 जुलाई 1875 को हुई थी
* इस एक्सचेंज की पहुंच 417 शहरों तक है
* बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज भारतीय शेयर बाज़ार के दो प्रमुख स्टॉक एक्सचेंजों में से एक है दूसरा एक्सचेंज नेशनल स्टॉक एक्सचेंज है
* भारत को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय बाजार में अपना श्रेष्ठ स्थान दिलाने में बीएसई की अहम भूमिका है
* एशिया के सबसे प्राचीन और देश के प्रथम स्टॉक एक्सचेंज को - बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज सिक्युरिटीज कांट्रेक्ट रेग्युलेशन एक्ट 1956 के तहत स्थाई मान्यता मिली है
* इसका लक्ष्य है - 'वैश्विक कीर्ति की पताका फहराकर प्रमुख भारतीय स्टाक एक्सचेंज के रूप में उभरना'
* भारतीय पूंजी बाजार के विकास में इस एक्सचेंज की व्यापक भूमिका रही है और इसका सूचकांक विश्वविख्यात है
* मैनेजिंग डायरेक्टर के नेतृत्व में डायरेक्टर्स बोर्ड द्वारा एक्सचेंज का संचालन होता है
* इस बोर्ड में प्रतिष्ठित प्रोफेशनल्स, ट्रेडिंग सदस्यों के प्रतिनिधियों और सार्वजनिक प्रतिनिधियों का समावेश है
* एक्सचेंज भारत के छोटे - बड़े शहरों में अपनी उपस्थिति के साथ राष्ट्रीय स्तर पर फैला हुआ है
* बीएसई की सिस्टम और प्रक्रिया ऐसी है कि बाजार की पारदर्शिता और सुरक्षा बनी रहे
* वैश्विक कीर्तिमान स्थापित कर, सर्वोच्च स्टाक एक्सचेंज के रूप में उभरने वाले इस एक्सचेंज के पास सवा सौ से अधिक वर्षों के भव्य इतिहास की समृद्ध विरासत है
* एक्सचेंज में `ट्रेडिंग राइट' और `ओनरशिप राइट' एक दूसरे से अलग है ऐसी परिस्थिती में निवेशकों के हितों पर विशेष सावधानी बरती जाती है
* एक्सचेंज इक्विटी, डेब्ट तथा प्युचर्स और ऑप्शन के व्यापार के लिए ढांचा एवं पारदर्शक ट्रेडिंग सिस्टम सुनिश्चित करता है
* बीएसई की आनलाइन ट्रेडिंग प्रणाली बेहतरीन गुणवत्तावाली है
* वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त इन्फार्मेशन सिक्युरिटी मैनेजमेंट सिस्टम का दर्जा BS 7799-2:2002 सर्टिफिकेट वाला है
* BS 7799 ऑडिट डीएनवी (Det Norske Veritas) द्वारा किया गया था यह प्रमाणपत्र प्राप्त करनेवाला बीएसई भारत का एकमात्र और विश्व का दूसरा एक्सचेंज है
* जानकारी एकत्रित करने, जोखिम को नियंत्रित करने तथा तकनीकी प्रणाली और लोगों की सम्पत्ती की सुरक्षा के लिए BS 7799 अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक है
* भारत में शायद ही ऐसी कोई कंपनी होगी जिसने पूंजी सर्जन के लिए बीएसई की सेवा नहीं ली हो
* बीएसई भारत में कैपिटल मार्केट का प्रतीक माना जाता है
* बीएसई सेंसेक्स देश के अर्थतंत्र और वित्त बाजार की गतिविधियों को प्रतिबिम्बित करता बेंचमार्क इक्विटी इंडेक्स है
* इक्विटी डेरीवेटिव्स, फ्री प्लोट इंडेक्स, यूएस डॉलर आधारित सेन्सेक्स, एक्सचेंज आधारित इंटरनेट ट्रेडिंग प्लेटफार्म स्थापित करने पहला एक्सचेंज है
* फाइनेंशियल ट्रेनिंग के लिए अलग विशेष सुविधा की व्यवस्था करने वाला पहला एक्सचेंज

Thursday, March 17, 2022

March 17, 2022

भारतीय राजनीति

 सीलबंद कवर न्यायशास्त्र



चर्चा में क्यों?

हाल ही में बिहार सरकार के खिलाफ एक आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने एक वकील को अदालत में 'सीलबंद कवर रिपोर्ट' प्रस्तुत करने के लिये कहा है।

  • बीते कुछ दिनों में विभिन्न न्यायालयों द्वारा ‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ का प्रायः इस्तेमाल किया गया है, उदाहरण के लिये राफेल फाइटर जेट समझौता (2018), बीसीसीआई सुधार मामला, भीमा कोरेगाँव मामला (2018) आदि।

‘सीलबंद कवर न्यायशास्त्र’ क्या है?

    • यह सर्वोच्च न्यायालय और कभी-कभी निचली अदालतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक प्रथा है, जिसके तहत सरकारी एजेंसियों से ‘सीलबंद लिफाफों’ में जानकारी मांगी जाती है और यह स्वीकार किया जाता है कि केवल न्यायाधीश ही इस सूचना को प्राप्त कर सकते हैं।
    • यद्यपि कोई विशिष्ट कानून ‘सीलबंद कवर’ के सिद्धांत को परिभाषित नहीं करता है, सर्वोच्च न्यायालय इसे सर्वोच्च न्यायालय के नियमों के आदेश XIII के नियम 7 और 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 से उपयोग करने की शक्ति प्राप्त करता है।
      • सर्वोच्च न्यायालय के आदेश XIII के नियम 7:
        • नियम के अनुसार, यदि मुख्य न्यायाधीश या अदालत कुछ सूचनाओं को सीलबंद लिफाफे में रखने का निर्देश देते हैं या इसे गोपनीय प्रकृति का मानते हैं, तो किसी भी पक्ष को ऐसी जानकारी की सामग्री तक पहुँच की अनुमति नहीं दी जाएगी, सिवाय इसके कि मुख्य न्यायाधीश स्वयं आदेश दे कि विपरीत पक्ष को इसे एक्सेस करने की अनुमति दी जाए।
        • इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि सूचना को गोपनीय रखा जा सकता है यदि इसके प्रकाशन को जनता के हित में नहीं माना जाता है।
      • वर्ष 1872 के भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 123:
        • इस अधिनियम के तहत राज्य के मामलों से संबंधित आधिकारिक अप्रकाशित दस्तावेज़ों की रक्षा की जाती है और एक सरकारी अधिकारी को ऐसे दस्तावेज़ों का खुलासा करने के लिये मजबूर नहीं किया जा सकता है।
        • अन्य उदाहरण जहाँ गोपनीयता या विश्वास के तहत जानकारी मांगी जा सकती है, इसका प्रकाशन जाँच में बाधा डालता है जैसे- विवरण (Details) जो पुलिस केस डायरी का हिस्सा है।

    सीलबंद कवर न्यायशास्त्र से संबंधित मुद्दे:

    • पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के खिलाफ:
      • यह भारतीय न्याय प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है, क्योंकि यह एक खुली अदालत के विचार के विरुद्ध है, जहाँ निर्णय सार्वजनिक जाँच के अधीन हो सकते हैं।
      • न्याय-निर्णयन की किसी भी प्रक्रिया में विशेष रूप से जिसमें मौलिक अधिकार शामिल हैं, इसके विवादों से संबंधित साक्ष्य " दोनों पक्षों के साथ साझा किये जाने चाहिये।"
    • दलीलों का दायरा कम करना:
      • अदालत के फैसलों में स्‍वेच्‍छाचारिता के दायरे को बढ़ाना, क्योंकि न्यायाधीशों को अपने फैसलों के लिये तर्क देना होता है, जो तब तक नहीं किया जा सकता, जब तक की वे गोपनीय रूप से प्रस्तुत की गई जानकारी पर आधारित न हों।
        • आगे इसका विरोध किया जाता है कि जब कैमरे के समक्ष सुनवाई जैसे मौजूदा प्रावधान पहले से ही संवेदनशील जानकारी को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करते हैं तो क्या राज्य को गोपनीयता के साथ जानकारी प्रस्तुत करने का ऐसा विशेषाधिकार दिया जाना चाहिये।
    • निष्पक्ष परीक्षण और न्याय-निर्णयन में बाधा:
      • यह भी तर्क दिया जाता है कि आरोपी पक्षों को ऐसे दस्तावेज़ो तक पहुँच प्रदान नहीं करना उनके निष्पक्ष परीक्षण और न्याय-निर्णयन के मार्ग में बाधा डालता है।
    • मनमानी प्रकृति:
      • सीलबंद कवर अलग-अलग न्यायाधीशों पर निर्भर होते हैं जो सामान्य अभ्यास के बजाय किसी विशेष मामले में एक बिंदु की पुष्टि करना चाहते हैं। यह अभ्यास को तदर्थ और मनमाना बनाता है

    सीलबंद कवर न्यायशास्त्र पर सर्वोच्च न्यायालय का दृष्टिकोण:

    • मॉडर्न डेंटल कॉलेज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2016) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इज़रायल के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश, अहरोन बराक द्वारा प्रस्तावित आनुपातिकता के परीक्षण को अपनाया, जिसके अनुसार "संवैधानिक अधिकार की एक सीमा संवैधानिक रूप से अनुमेय होगी यदि:
      • इसे एक उचित उद्देश्य के लिये नामित किया गया है।
      • इस तरह की सीमा को लागू करने के लिये किये गए उपाय तर्कसंगत रूप से उस उद्देश्य की पूर्ति से जुड़े हों।
      • किये गए उपाय इसलिये आवश्यक हैं क्योंकि ऐसा कोई वैकल्पिक उपाय मौजूद नहीं है जो समान रूप से उसी उद्देश्य को कम सीमा के साथ प्राप्त कर सके।
      • उचित उद्देश्य को प्राप्त करने के महत्त्व और संवैधानिक अधिकार की सीमा निर्धारित करने के सामाजिक महत्त्व के बीच एक उचित संबंध (‘proportionality stricto sensu’ or ‘balancing’) हो।
    • के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) मामले में इस बात को दोहराया गया था।
    • पी. गोपालकृष्णन बनाम केरल राज्य के मामले में 2019 के फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि आरोपी द्वारा दस्तावेज़ों का खुलासा करना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, भले ही जाँच जारी हो क्योंकि दस्तावेज़ों से मामले की जाँच में सफलता मिल सकती है।
    • वर्ष 2019 में INX मीडिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा सीलबंद लिफाफे में जमा किये गए दस्तावेज़ों के आधार पर पूर्व केंद्रीय मंत्री को जमानत देने से इनकार करने के अपने फैसले को आधार बनाने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय की आलोचना की थी।

    आगे की राह

    • न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराती है।
    • कार्यपालिका को अपने कार्यों का दृढ़ता से जवाब देना चाहिये- विशेष रूप से तब जब मौलिक अधिकारों, जैसे कि स्वतंत्रत अभिव्यक्ति में कटौती की जाती है। भारत का संविधान कार्यपालिका को ऐसे अधिकारों का उल्लंघन करने वाले मनमाने आदेश पारित करने की छूट नहीं देता है।
    • एक न्यायालय जो किसी भी कार्यकारी कार्रवाई के दौरान मूकदर्शक बना रहता है, वह अपरिष्कृत रूप से लोकतांत्रिक विनाश को दर्शाता है।
    • जब किसी कार्रवाई पर मौलिक अधिकारों को कम करने का आरोप लगाया जाता है, तो न्यायालय आनुपातिकता की दृष्टि से कार्रवाई की वैधता की जाँच करने के लिये बाध्य होता है।
    March 17, 2022

    जीव विज्ञान और पर्यावरण

     भारत की सौर क्षमता स्थिति

    चर्चा में क्यों?

    वर्ष 2021 में भारत ने अपनी संचयी स्थापित क्षमता में रिकॉर्ड 10 गीगावाट (GW) सौर ऊर्जा की वृद्धि की।

    • यह वृद्धि 12 महीनों के दौरान उच्चतम क्षमता वृद्धि रही है, इसके साथ ही सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वर्ष-दर-वर्ष लगभग 200% की वृद्धि दर्ज की गई है।
    • अब (28 फरवरी, 2022 तक) भारत 50 GW संचयी स्थापित सौर क्षमता से आगे निकल गया है।
    • 50 GW स्थापित सौर क्षमता में से 42 GW ग्राउंड-माउंटेड सोलर फोटोवोल्टिक (PV) सिस्टम से प्राप्त होती है और केवल 6.48 GW रूफ-टॉप सोलर (RTS) से तथा 1.48 GW सोलर PV के अन्य तरीकों से प्राप्त होती है।

    उपलब्धि का महत्त्व:

    • यह वर्ष 2030 तक अक्षय ऊर्जा से 500 GW ऊर्जा (जिसमें से सौर ऊर्जा के क्षेत्र से 300 गीगावाट ऊर्जा प्राप्त किये जाने की उम्मीद है) के उत्पादन में भारत की यात्रा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
    • ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के बाद भारत सौर ऊर्जा विस्तार के मामले में पाँचवें स्थान पर आ गया है और यह 709.68 GW की वैश्विक संचयी क्षमता में लगभग 6.5% का योगदान देता है।

    रूफ-टॉप सोलर इंस्टालेशन में भारत क्यों पिछड़ रहा है?

    • विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा का लाभ उठाने में विफल:
      • बड़े पैमाने पर सोलर फोटोवोल्टिक (Solar PV) पर ध्यान केंद्रित करने के कारण भारत विकेंद्रीकृत अक्षय ऊर्जा (DRE) विकल्पों के कई लाभों का फायदा उठाने में विफल रहा है, जिसमें ट्रांसमिशन और वितरण (T&D) घाटे में कमी शामिल है।
    • सीमित वित्तपोषण:
      • सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम प्रौद्योगिकी के प्राथमिक लाभों में से एक है, इसे ऊर्जा खपत के रूप में स्थापित करके बड़े पूंजी-गहन संचरण बुनियादी ढाँचे की आवश्यकता को कम किया जा सकता है।
        • भारत को बड़े और छोटे दोनों पैमाने पर सोलर फोटोवोल्टिक सिस्टम को स्थापित करने के साथ-साथ विशेष रूप से RTS प्रयासों का विस्तार करने की ज़रूरत है।
      • हालाँकि आवासीय उपभोक्ताओं और छोटे एवं मध्यम उद्यम (SMEs) जो RTS स्थापित करना चाहते हैं, के लिये वित्तपोषण सीमित है। 
    • विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMS) की उदासीन प्रतिक्रियाएँ:
      • नेट मीटरिंग आरटीएस को समर्थन देने के लिये बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMS) की रुचि में कमी देखने को मिल रही है।

    भारत की सौर ऊर्जा क्षमता में वृद्धि के समक्ष चुनौतियाँ: 

    • स्थापित सौर क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद देश के बिजली उत्पादन में सौर ऊर्जा का योगदान उसी गति से नहीं बढ़ा है
    • उदाहरण के लिये वर्ष 2019-20 में सौर ऊर्जा ने भारत की कुल 1390 BU बिजली उत्पादन में केवल 3.6% (50 बिलियन यूनिट) का योगदान दिया।
    • उपयोगिता-पैमाने पर सोलर PV क्षेत्र को भूमि लागत, उच्च T&D नुकसान और अन्य अक्षमताओं तथा ग्रिड एकीकरण जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
    • स्थानीय समुदायों और जैवविविधता संरक्षण मानदंडों के बीच भी टकराव की स्थिति रही है। इसके अलावा भले ही भारत ने यूटिलिटी-स्केल सेगमेंट में सौर ऊर्जा उत्पादन के लिये रिकॉर्ड कम टैरिफ हासिल किया है लेकिन इससे अंतिम उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली सुलभ नहीं हुई है।
    • अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (IRENA) का अनुमान है कि सोलर PV अपशिष्ट से पुनर्प्राप्त करने योग्य सामग्रियों का वैश्विक मूल्य 15 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक हो सकता है।
    • वर्तमान में केवल यूरोपीय संघ ने सोलर PV अपशिष्ट के प्रबंधन में निर्णायक कदम उठाए हैं
    • भारत विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) के आसपास उपयुक्त दिशा-निर्देश विकसित करने पर विचार कर सकता है, जिसका अर्थ है कि सौर पीवी उत्पादों के समग्र जीवन चक्र के लिये निर्माताओं को उत्तरदायी बनाया जाएगा और अपशिष्ट पुनर्चक्रण हेतु मानक विकसित किये जाएंगे।
      • यह घरेलू निर्माताओं को प्रतिस्पर्द्धा में बढ़त दे सकता है और अपशिष्ट प्रबंधन एवं आपूर्ति पक्ष की बाधाओं को दूर करने में महत्त्वपूर्ण हो सकता है।

    भारत की घरेलू सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता की मौजूदा स्थिति:

    • सौर क्षेत्र में घरेलू विनिर्माण क्षमता देश में सौर ऊर्जा की वर्तमान संभावित मांग के अनुरूप नहीं है।
      • भारत में सौर सेल उत्पादन के लिये 3 गीगावाट क्षमता और सौर पैनल उत्पादन क्षमता के लिये 8 गीगावाट क्षमता थी। इसके अलावा सौर मूल्य शृंखला में एकीकरण का अभाव है, क्योंकि भारत में सौर वेफर्स और पॉलीसिलिकॉन के निर्माण की कोई क्षमता नहीं है।
      • वर्ष 2021-22 में भारत ने अकेले चीन से लगभग 76.62 बिलियन अमेरिकी डॉलर मूल्य के सौर सेल और मॉड्यूल आयात किये, जो उस वर्ष भारत के कुल आयात का 78.6% था।
      • कम विनिर्माण क्षमता और चीन से सस्ते आयात ने भारतीय उत्पादों को घरेलू बाज़ार में गैर-प्रतिस्पर्द्धी बना दिया है।
    • हालाँकि यदि भारत सौर प्रणालियों के लिये एक ‘सर्कुलर अर्थव्यवस्था मॉडल’ को अपनाता है, तो इस स्थिति में आसानी से सुधार किया जा सकता है। 
      • इससे सोलर पीवी वेस्ट को सोलर पीवी सप्लाई चेन में रिसाइकिल और दोबारा इस्तेमाल किया जा सकेगा। अनुमान के अनुसार, वर्ष 2030 के अंत तक भारत लगभग 34,600 मीट्रिक टन सौर पीवी कचरे का उत्पादन करेगा।

    आगे की राह

    • सरकारों, विभिन्न इकाइयों/यूटिलिटीज़ और बैंकों को ऐसे नवीन वित्तीय तंत्रों की तलाश करने की आवश्यकता होगी जो ऋण की लागत में कमी और उधारदाताओं के लिये निवेश के जोखिम को कम करते हों।
    • जागरूकता में वृद्धि और RTS परियोजनाओं के लिये किफायती वित्त संभावित रूप से देश भर में SMEs और घरों में RTS का प्रसार सुनिश्चित कर सकता है।
    • छत के रिक्त स्थान का उपयोग करने से RTS स्थापित करने की समग्र लागत को कम करने और अर्थव्यवस्था के परिमाणात्मक विकास को सक्षम करने में मदद मिल सकती है।
    • वर्ष 2015 में पक्षकारों के सम्मेलन (COP-21) में भारत और फ्राँस द्वारा स्थापित अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) के माध्यम से एक प्रभावशाली घरेलू ट्रैक रिकॉर्ड के अलावा ऐसे मुद्दों पर सौर ऊर्जा पर निवेश जुटाने, क्षमता निर्माण, कार्यक्रम का समर्थन करने व विश्लेषण जैसी सहयोग सुविधाएँ प्रदान करने के लिये देशों को एक साथ लाने हेतु एक वैश्विक मंच भी उपलब्ध है।
    • भविष्य में प्रौद्योगिकी साझाकरण और वित्त भी ISA के महत्त्वपूर्ण पहलू बन सकते हैं, जिससे सौर ऊर्जा के क्षेत्र में देशों के बीच सार्थक सहयोग की अनुमति मिल सकती है।

    Wednesday, March 16, 2022

    March 16, 2022

    जीव विज्ञान और पर्यावरण


    चर्चा में क्यों?

    हाल ही में जल शक्ति मंत्रालय ने ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ हेतु अनुमोदन प्रक्रिया की धीमी गति पर नाराज़गी व्यक्त की है।

    क्या है ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’?

    • इस पहल को वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (NGC) की पहली बैठक में सैद्धांतिक मंज़ूरी मिली थी।
      • ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ वर्ष 2019 में स्वीकृत सरकार की एक महत्त्वाकांक्षी अंतर-मंत्रालयी पहल- ‘अर्थ गंगा’ के तहत नियोजित गतिविधियों में से एक है।
    • ‘प्रोजेक्ट डॉल्फिन’ को ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की तर्ज़ पर शुरू किया गया है, ज्ञात हो कि ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ का उद्देश्य बाघों की आबादी बढ़ाने में मदद करना है।
    • इसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा लागू किया गया है।
      • गंगा डॉल्फिन, जो कि एक राष्ट्रीय जलीय जानवर है और कई राज्यों में विस्तृत गंगा नदी के लिये संकेतक प्रजाति भी है, के लिये एक विशेष संरक्षण कार्यक्रम शुरू किये जाने की आवश्यकता है।
        • संकेतक प्रजातियाँ अक्सर सूक्ष्मजीव या पौधा होते हैं, जो किसी विशिष्ट क्षेत्र में मौजूद पर्यावरणीय परिस्थितियों की माप के रूप में कार्य करते हैं।
      • चूँकि गंगा डॉल्फिन खाद्य शृंखला के शीर्ष पर है, प्रजातियों और उसके आवास की रक्षा करने से नदी के जलीय जीवन का संरक्षण सुनिश्चित होगा।
      • अब तक राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG), जो सरकार की प्रमुख योजना नमामि गंगे को लागू करती है, डॉल्फिन को बचाने हेतु पहल कर रहा है।
    • वैश्विक अनुभव: राइनो संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय आयोग (ICPR) के राइनो एक्शन प्लान (1987), जिसमें स्विट्ज़रलैंड, फ्राँस, जर्मनी, लक्ज़मबर्ग और नीदरलैंड शामिल हैं, के कारण सैल्मन मछली (एक संकेतक प्रजाति) के संरक्षण में मदद मिली।
    • गंगा डॉल्फिन से संबंधित महत्त्वपूर्ण बिंदु:dolphin

      • वैज्ञानिक नाम: प्लैटनिस्टा गैंगेटिका (Platanista gangetica)
      • खोज: आधिकारिक तौर पर इसकी खोज वर्ष 1801 में की गई थी।
      • आवास: ये नेपाल, भारत और बांग्लादेश की गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना और कर्णफुली-सांगु नदी प्रणालियों में रहती हैं।
        • गंगा नदी डॉल्फिन केवल मीठे/ताज़े जल में रह सकती है और यह वास्तव में दृष्टिहीन होती है।
        • ये पराश्रव्य ध्वनियों का उत्सर्जन करके शिकार करती हैं, जो मछलियों और अन्य शिकार से टकराकर वापस लौटती है तथा उन्हें अपने दिमाग में एक छवि "देखने" में सक्षम बनाती है। इन्हें 'सुसु' (Susu) भी कहा जाता है।
      • आबादी: इस प्रजाति की वैश्विक आबादी अनुमानतः 4,000 है और इनमें से लगभग 80% भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती है।
      • महत्त्व:
        • यह संपूर्ण नदी पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य का एक विश्वसनीय संकेतक है।
      • खतरा:
        • अवांछित शिकार: लोगों की तरह ही ये डॉल्फिन नदी के उन क्षेत्रों में रहना पसंद करती हैं जहाँ मछलियाँ बहुतायत मात्रा में हों और पानी का प्रवाह धीमा हो।
          • इसके कारण लोगों को मछलियाँ कम मिलती हैं और मछली पकड़ने के जाल में गलती से फँस जाने के कारण गंगा डॉल्फिन की मृत्यु हो जाती है, जिसे बायकैच (Bycatch) के रूप में भी जाना जाता है।
        • प्रदूषण: औद्योगिक, कृषि एवं मानव प्रदूषण इनके प्राकृतिक निवास स्थान के क्षरण का एक और गंभीर कारण है।
        • बाँध: बाँधों और सिंचाई से संबंधित अन्य परियोजनाओं का निर्माण उन्हें सजातीय प्रजनन (Inbreeding) के लिये संवेदनशील बनाने के साथ अन्य खतरों के प्रति भी सुभेद्य बनाता है क्योंकि ऐसे निर्माण के कारण वे अन्य क्षेत्रों में नहीं जा सकती हैं
          • एक बाँध के अनुप्रवाह में भारी प्रदूषण, मछली पकड़ने की गतिविधियों में वृद्धि और पोत यातायात से डॉल्फिन के लिये खतरा उत्पन्न होता है। इसकी वजह से उनके लिये भोजन की भी कमी होती है क्योंकि बाँध मछलियों और अन्य शिकारों के प्रवासन, प्रजनन चक्र तथा निवास स्थान को प्रभावित करता है।
      • संरक्षण स्थिति:
        • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची-I
        • IUCN रेड लिस्ट: संकटग्रस्त (Endangered)
        • ‘वन्यजीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अभिसमय’ (CITES): परिशिष्ट-I
        • वन्यजीवों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर अभिसमय (CMS): परिशिष्ट II (प्रवासी प्रजातियाँ जिन्हें संरक्षण और प्रबंधन की आवश्यकता है या जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से काफी लाभ होगा)।
      • संरक्षण हेतु अन्य पहल:
        • राष्ट्रीय डॉल्फिन अनुसंधान केंद्र (NDRC): लुप्तप्राय गंगा नदी डॉल्फिन के संरक्षण के लिये पटना विश्वविद्यालय के परिसर में 4,400 वर्ग मीटर भूमि के भूखंड पर NDRC की स्थापना की जा रही है।
        • डॉल्फिन अभयारण्य: बिहार के भागलपुर ज़िले में विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभयारण्य की स्थापना की गई है।
        • राष्ट्रीय गंगा डॉल्फिन दिवस: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन द्वारा प्रतिवर्ष 5 अक्तूबर को गंगा डॉल्फिन दिवस के रूप में मनाया जाता है।
        • संरक्षण योजना: ‘गंगा डॉल्फिन संरक्षण कार्य योजना 2010-2020’ गंगा डॉल्फिन के संरक्षण के प्रयासों में से एक है, इसके तहत गंगा डॉल्फिन और उनकी आबादी के लिये प्रमुख खतरों के रूप में नदी में यातायात, सिंचाई नहरों और शिकार की कमी आदि की पहचान की गई है।